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Thursday, May 13, 2021

*रोज कमाने खाने वालों की कौन सुनेगा पुकार,इनको भी है मदद की दरकार* शिवशंकर पाण्डेय

बिरसा -  सालेटेकरी।2020 से शुरू हुआ कोरोना महामारी का दंश आज पूरा देश झेल रहा है।मार्च 2020 में लगा कोरोना लॉकडाउन से देश की जनता उबर भी नही पाई थी कि एक साल बाद यानी मार्च 2021 से पुनः देश की जनता को घरों में कैद होने पर मजबूर होना पड़ा।वजह थी कोरोना की बढ़ती रफ्तार।मानो इस बार कोरोना ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया था क्या शहर क्या गांव चारो तरफ कोरोना से मरने वालों के सगे संबंधियों की चीख पुकार सुनाई दे रही थी।ऐसे में रोज ।कमाने खाने वालों पर जैसे मुशीबतों का पहाड़ टूट पड़ा।लॉकडाउन में सबसे ज्यादा प्रभावित वह लोग हुए जो पान का ठेला लगाकर,सायकिल मरम्मत की दुकान चलाकर, छोटी सी किराना दुकान चलाकर, अखबार बांटने वाले, बसों के चालक परिचालक,गांव शहर में समाचार का संकलन करने वाले, हाथ ठेला,रिक्शा चलाने वाले,रोज मेहनत मजदूरी कर अपना व अपने परिवार का पेट भरते थे।इसमें भी निम्न मध्यम वर्गीय परिवार वाले कुछ ज्यादा ही परेशान हैं।

वजह है सरकार के निगाह में यही लोग देश के सबसे अमीर है।लेकिन स्तिथि सरकार की सोच से विपरीत है।लॉकडाउन में राज्य सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को तीन महीने का राशन मुफ्त दे रही है जो सराहनीय है लेकिन क्या सरकार ने कभी उन परिवारों से भी पूछा जो सरकार के नजर में गरीब नही है लेकिन वास्तव में ये लोग इतने गरीब होते हैं कि दो वक्त की रोटी के लिए इन परिवारों को बहुत जद्दोजहद करना पड़ता है।आज देश मे जो गरीब है वह और ज्यादा गरीब होता जा रहा है और जो अमीर है उनका क्या कहना।लॉकडाउन की वजह से सभी लोग परेशान है चाहे वह जनरल हो,ओबीसी हो या अन्य।आज देश को जाति देखकर आरक्षण देने की जरूरत नही है जरूरत है तो गरीबी दूर करने की।वोट की राजनीति के लिए साल दर साल आरक्षण बढ़ाया जा रहा है जो गलत है।अगर देश से गरीबी हटाना है तो महंगाई को कम करना पड़ेगा जिससे सभी वर्ग के लोग परेशान हैं।जनता की जरूरत के सामानों पर सरकार ने इतना ज्यादा टेक्स लगा दिया है 

कि दो रुपये का सामान दस में मिल रहा है जिससे देश की जनता और गरीब होती जा रही है।स्वास्थ्य और शिक्षा को क्यों नही सरकार फ्री करती जिससे लोगो की कमर टूट रही है।कहने को तो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिये यह सुविधा भी उपलब्ध है लेकिन हकीकत कुछ और है।आज देश का हर वह व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना पसंद नही करता चाहे वह गरीब हो या अमीर।वजह है सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और जो है भी वह पढ़ाने में कम ही रुचि रखते हैं जिससे सरकारी स्कूलों की दुर्दशा पर रोना आता है।पालक मजबूर होकर अपने बच्चों का भविष्य सुधारने के लिए प्राइवेट स्कूलों में एडमिशन कराते हैं 

जहां इनकी जमकर जेब ढीली होती है।यही हाल लगभग सभी सरकारी अस्पताल का भी है जिनकी हालत खराब रहती है किसी अस्पताल में चिकित्सक नही है तो किसी मे दवाई व अन्य सुविधाओं का अभाव है जिसको देखकर जनता प्राइवेट डॉक्टर व अस्पतालों का रुख करती है जहाँ इनको जमकर लूटा खसोटा जाता है।आज अगर सरकार ने इन निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की सुध नही ली तो आने वाले समय मे इन परिवारों को भूखों मरने की नौबत आ जायेगी जिसके लिए कहीं न कहीं सरकार भी दोषी होगी।

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