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Sunday, September 19, 2021

भगवान विष्णु को समर्पित है अनंत चतुर्दशी - अरविन्द तिवारी

  

 रायपुर - प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी व्रत मनाया जाता है , जो इस बार आज 19 सितंबर को है। अनंत यानि जिसके ना आदि का पता है और ना ही अंत का , अर्थात वे स्वयं श्री हरि ही हैं। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन अनंत सूत्र को बांधने और व्रत रखने से कई तरह की बाधाओं से मुक्ति मिलती है. अनंत चतुर्दशी का दिन का भगवान विष्‍णु के लिए ही मनाया जाता है. 

भक्‍त इस दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं. वहीं ऐसी धारणा है कि सच्‍चे मन से की कई पूजा से भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।इस व्रत में स्नानादि करने के बाद अक्षत , दूर्वा , शुद्ध रेशम या कपास के सूत से बने और हल्दी से रंगे हुये चौदह गांठ के अनंत को सामने रखकर हवन किया जाता है। फिर अनंत देव का ध्यान करके इस शुद्ध अनंत , जिसकी पूजा की गई होती है , को पुरुष दाहिनी और स्त्री बायीं भुजा/हाथ में बांधते हैं। इस व्रत के रखने से घर की नकारात्मक ऊर्जा के साथ-साथ जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। पुराणों में अनंत चतुर्दशी की कथा के युधिष्ठिर से सम्बंधित होने का उल्लेख मिलता है।

 द्वापरयुग में जब पांडव जुआ में अपना सब कुछ हारकर वन में भटक रहे थे , तब भगवान श्रीकृष्ण ने अंत चतुर्दशी के व्रत रखने की सलाह दी थी। इसके बाद ही उन पर  से संकट के बादल छंटने शुरू हो गये और उन्होंने कौरवों का अंत कर अपने सारे अधिकार वापस प्राप्त कर लिये।

गणेश विसर्जन क्यों ?

इसी दिन गणेश महोत्सव का समापन होता है और प्रथम पूज्य गणेश जी की मूर्तियों का विसर्जन भी गणेश भक्तों द्वारा किया जाता है। गणेश विसर्जन के कारण लोग इस दिन को गणपति के पूजन का दिन समझते हैं लेकिन वास्तव में ये पावन पर्व श्रीहरि की पूजा का है। गणेश चतुर्थी के दिन स्‍थापित किये गये गणपति का विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाता है। इसके पीछे पौराणिक कहानी यह है कि जिस दिन वेद व्‍यासजी ने महाभारत लिखने के लिये गणेशजी को महाभारत की कथा सुनानी शुरू की थी 

उस दिन भाद्रशुक्ल चतुर्थी तिथि थी। कथा सुनाते समय वेदव्‍यासजी ने आंखें बंद कर ली और गणेशजी को लगातार दस दिनों तक कथा सुनाते रहे और गणेशजी लिखते रहे। दसवें दिन जब वेदव्‍यासजी ने आंखें खोली तो देखा कि एक जगह बैठकर लगातार लिखते-लिखते गणेशजी के शरीर का तापमान काफी बढ़ गया है। ऐसे में वेदव्यासजी ने गणपति को ठंडक प्रदान करने के लिये ठंडे जल में डुबकी लगवाई। 

जहां पर वेदव्यासजी के कहने पर गणपति महाभारत लिख रहे थे वहां पास ही अलकनंदा और सरस्वती नदी का संगम है। जिस दिन सरस्वती और अलकनंदा के संगम में वेदव्यासजी को डुबकी लगवाई उस दिन अनंत चतुर्दशी का दिन था। यही वजह है कि चतुर्थी पर स्‍थापित होने के बाद गणेशजी का विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाता है।

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