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Thursday, April 2, 2026

प्राइवेट स्कूलों का खोखलापन “शिक्षा व्यापार और गुमराह होता बचपन” - अंजू नरवरे

 प्राइवेट स्कूलों का खोखलापन




“शिक्षा व्यापार और गुमराह होता बचपन” -  अंजू नरवरे


लेखिका: अंजू नरवरे


उम्र: 16 वर्ष | कक्षा: दसवीं (परीक्षा दे चुकी)


भोपाल मध्यप्रदेश। आज के समय में प्राइवेट स्कूल, जो कभी शिक्षा के मंदिर माने जाते थे, धीरे-धीरे मुनाफे की दुकानों में बदलते जा रहे हैं। यहां शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना नहीं बल्कि व्यवसाय करना बन गया है। बच्चों के भविष्य और व्यक्तित्व विकास की जगह अब केवल सिलेबस पूरा करने पर ध्यान दिया जाता है।


शिक्षा नहीं, व्यापार का केंद्र


आज कई प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों का मुख्य उद्देश्य केवल कोर्स खत्म करना रह गया है।


बच्चों की रुचि और क्षमता को समझने की कोशिश नहीं की जाती


नैतिक शिक्षा और संस्कारों का अभाव है


जीवन जीने के कौशल (Life Skills) नहीं सिखाए जाते


एक सच्चे शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं बल्कि छात्र को सही दिशा देना भी होता है।


हार्मोनल बदलाव और ‘प्यार’ का भ्रम


14 से 18 वर्ष की उम्र में बच्चों में शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं।


जानकारी के अभाव में कई बच्चे इन भावनाओं को ‘प्यार’ समझ लेते हैं, जिससे उनका ध्यान पढ़ाई और करियर से भटक जाता है।


सुझाव


स्कूलों में आधुनिक तकनीक और AI के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं


बच्चों को वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके से समझाया जाए कि यह एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है


इस उम्र में करियर निर्माण पर फोकस करना जरूरी है


सुरक्षा और गोपनीय शिकायत प्रणाली


आज कई बच्चे अपनी समस्याएं बताने से डरते हैं क्योंकि उन्हें स्कूल प्रबंधन का दबाव झेलना पड़ता है।


प्रस्ताव:


हर स्कूल में एक गोपनीय शिकायत पेटी अनिवार्य हो


इसकी चाबी केवल सरकारी शिक्षा अधिकारी के पास हो


शिकायत सीधे उच्च स्तर (जैसे शिक्षा मंत्री) तक पहुंचे


जब तक एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र नहीं होगा, तब तक बच्चों के साथ होने वाले शोषण को रोकना मुश्किल है।


आत्मरक्षा और व्यवहारिक शिक्षा का अभाव


केवल किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है।


जरूरी सुधार:


हर लड़की को आत्मरक्षा (Self Defense) की ट्रेनिंग दी जाए


लड़कों को महिलाओं का सम्मान और सही संगत की शिक्षा दी जाए


कक्षा 8 के बाद अंग्रेजी बोलना और समझना अनिवार्य किया जाए


इससे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे हीन भावना से बचेंगे।


माता-पिता का संघर्ष और सरकार की जिम्मेदारी


कई माता-पिता खुद शिक्षित नहीं होते, फिर भी वे अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस भरते हैं।


सरकार की भूमिका:


प्राइवेट स्कूलों के लिए सख्त नियम बनाए जाएं


नियमित और पारदर्शी निरीक्षण किया जाए


शिक्षा को व्यवसाय बनने से रोका जाए


शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रक्रिया है।


यदि समय रहते प्राइवेट स्कूलों की व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ी केवल पढ़ी-लिखी होगी, शिक्षित नहीं।

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