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Tuesday, October 13, 2020

भेद के सदुपयोग से निर्भेद परमात्मा की प्राप्ति संभव -- पुरी शंकराचार्य



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जगन्नाथपुरी -- ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठ में श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग के पावन सानिध्य में आयोजित  हिन्दू राष्ट्र संघ अधिवेशन के तीन चरणों में लगभग 45 विभिन्न  देशों के 116 प्रतिनिधियों ने भाग लेकर अपने विचार प्रस्तुत किये। अधिवेशन के अंतिम चरण में एकदिवसीय संगोष्ठी दिनांक 18 अक्टूबर को आयोजित है। तृतीय चरण के अंतिम दिवस को रत्नेंदु भट्टाचार्य बंगलादेश , गणेश कुमार भूटान , विद्याभूषण धर कनाडा  , अजय गोयल तंजानिया ,मनीषा कंथालिया केन्या ने अपने भाव व्यक्त किये। इस अवसर पर के सिद्धार्थ , उमेश परमार यमन भी उपस्थित रहे। पूज्यपाद पुरी शंकराचार्य जी ने अपने उद्बोधन में संकेत किया कि धर्म धारक एवं उद्धारक होता है। पृथ्वी का धारक सन्निकट निर्विशेष जल है , ठीक इसी प्रकार जल का धारक तेज , तेज का धारक वायु , वायु का धारक आकाश फिर अव्यक्त सृष्टि माया फिर अंत में परमात्मा धारक सिद्ध होते हैं। धर्म के दो रूप एक सिद्ध कोटि का दूसरा भव्य कोटि का होता है। पृथ्वी में गंध , रस , रुप , स्पर्श और शब्द पांच गुण , गंध को छोड़कर बाकी चार गुण जल में , जल के रस को छोड़कर बाकी तीन गुण तेज में , रुप को छोड़कर स्पर्श एवं शब्द गुण वायु में तथा आकाश में सिर्फ एक गुण शब्द होता है। आकाश से एक गुण कम अव्यक्त सृष्टि में बीज रूप में होता है , फिर परम ब्रह्म परमात्मा निर्गुण निराकार होते हैं। शास्त्रीय विधा से यज्ञ का संपादन करने पर त्यागमय जीवन तथा त्याग की भावना जागृत होने पर शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। गाढ़ी नींद की अवस्था में कर्मेन्द्रिय , ज्ञानेन्द्रिय , प्रिय , मोद, प्रमोद से मुक्त रहने पर भी त्याग के बल की प्राप्ति होती है। जन्म का पर्यावसान मृत्यु तथा मृत्यु का पर्यावसान जन्म है। जिस गुण विशेष के कारण वस्तु की सत्ता या उपयोगिता सिद्ध होती है , वह धर्म है। वर्णाश्रम व्यवस्था से शिक्षा मिलती है कि शास्त्रसम्मत भेद को नहीं मानने पर हम उपस्थित भेद का लाभ नहीं ले सकते । प्रकृति प्रदत्त भेद साधक होता है ,बाधक नहीं इस सिद्धांत का पालन हितकर है। भेद की उपयोगिता यह है कि इसके सदुपयोग से निर्भेद परमात्मा की प्राप्ति होती है। भौतिकवादी सोच की विफलता यह है कि उसमें विषयजन्य आनन्द की प्रधानता है। तब वह प्रिय , मोद ,प्रमोद से विरक्त होकर नींद क्यों चाहता है ? क्योंकि बिना नींद के वह विक्षिप्त हुये बिना नहीं रहेगा। इस भूमण्डल के राजा को जितना आनंद प्राप्त होता है उसकी तुलना में ब्रह्माजी को हजार परार्ध अधिक आनन्द प्राप्त है फिर भी उन्हें योग निद्रा की आवश्यकता है। तात्पर्य यह है कि जिनको निर्विकल्प समाधि उपलब्ध नहीं होती उनको समाधि के एक रुप में गाढ़ी नींद परमात्मा ने प्रदान की है। वर्तमान विश्व धर्म और मोक्ष की पहुंच से दूर है ,वह अर्थ एवं काम को अपनी मुट्ठी में समझता है , जबकि वास्तविकता यह है कि 99 प्रतिशत अर्थ की उसको समझ नहीं , सभी प्रकल्प अनर्थ साबित हो रहे हैं।शास्त्रसम्मत विधा से किसी क्षेत्र विशेष की 80 प्रतिशत समस्या  सद्भावपूर्ण सम्वाद एवं परस्पर सहयोग से प्राप्त सामग्री तथा सेवाप्रकल्प से हल की जा सकती है। इस कार्य के लिये प्रत्येक हिन्दू परिवार एक रूपया एक घंटा उस क्षेत्र को समृद्ध , स्वावलंबी बनाने में सहयोग करे। शेष समस्याओं का 16 प्रतिशत क्षेत्रीय शासन एवं चार प्रतिशत केन्द्रीय शासन हल करने के लिये स्वमेव बाध्य होगा।

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