अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जांजगीर चांपा - श्रीमद्भागवत की कथा ही हमें आत्मा व परमात्मा के मिलन का मार्ग दिखाती हैं। भगवान की कथा में जब तक हमारा मन प्रीति नही रखेगा तब तक आत्मा से परमात्मा का मिलन हो ही नहीं सकता। आत्मा परमात्मा का मिलन तभी संभव हो पावेगा जब हमारा मन निरन्तर भगवान व भगवान की कथा में प्रीति रखेगा। इसलिये भगवत कथा में हर प्राणी को निरन्तर जुड़े रहने की आवश्यकता हैं।
उक्त बातें जांजगीर बाजारपारा स्थित अशोक शर्मा के निवास में चल रहे संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस भागवताचार्य संदीप मिश्रा ने कही।महाराजश्री ने महारास की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुये कहा कि गोपी कोई और नहीं बल्कि सभी वेदों की ऋचायें हैं जो भगवान श्रीकृष्ण से मिलने की इच्छा लेकर अपनी बात रखतीं हैं। भगवान श्रीकृष्ण शरदपूर्णिमा के पावन बेला में अपनी बंशी की माधुर्य रस ध्वनि से सभी गोपी को बुलाते हैं। जब गोपी उस बाँसुरी की तन को सुनते है तो अपने सभी काम को छोंड़ दौड़े भागे यमुना तट पर आती हैं। तब भगवान कहते हैं गोपियों तुम अपने घर जाओ रात्रि काल का समय कोई ऐसे घूमता है क्या ? तब गोपी सभी कृष्ण से रास महारास करने को कहती हैं भगवान आज सभी गोपियों के साथ जितने गोपी उतने कृष्ण बनकर रास रचाते हैं। इसी बीच गोपियों को अभिमान हो जाता हैं औऱ वे सोचने लगते हैं जिन्हें सारी दुनियां भगवान मानती है वे हमारे साथ हमारे कहने पर रास रचा रहे हैं। तभी गोपियों की मन मे अंहकार देखकर श्रीकृष्ण वहाँ से अंतर्ध्यान हो जाते हैं और सभी गोपियाँश्री कृष्ण के विरह में व्याकुल होकर घूमती है , उन्हें खोजती हैं। जस गोपियों का अभिमान टूट जाता है तब भगवान श्रीकृष्ण पुन: प्रकट हो जाते हैं। अब गोपियाँ श्रीकृष्ण की आस - पास आकर भाव से बैठ जाती हैं और अपना अभिमान त्यागकर महारास करने को कहती हैं। ईधर भगवान भोलेनाथ भी माता पार्वती के साथ नारी बनकर साड़ी पहनकर महारास में प्रवेश कर जाते हैं इसी बीच कामदेव प्रभु की परीक्षा लेने आता हैं लेकिन हार जाता हैं औऱ इस रास में परमात्मा रूपी कृष्ण व आत्मा रूपी गोपी का सहज मिलन होता हैं।गोपी गीत के बाद महाराजश्री ने भगवान श्रीकृष्ण और रूखमणी विवाह की रोचक कथा सुनाते हुये बताया कि रुखमणी के भाई उनकी शादी शिशुपाल से करना चाहते थे लेकिन वे भगवान श्रीकृष्ण को पतिरूप में स्वीकार कर चुकीं थीं। आचार्यश्री ने बताया कि भीष्मक का बड़ा पुत्र रुकनी भगवान श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था , वह अपनी बहन रुकखमणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। श्रीकृष्ण के पास जब रुक्मणी ने संदेश भेजा था कि रुक्मणी के घरवाले इनका विवाह कहीं और करना चाहते हैं तब उन्होंने श्री कृष्ण से कहा वह श्री कृष्ण से ही विवाह करना चाहती हैं। जिस दिन शिशुपाल से उनका विवाह होने वाला था उस दिन वे मंदिर गईं और जैसे ही पूजा करके बाहर निकलीं। उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने उसके समर्पण को स्वीकार कर विद्युत तरंग की भांति पहुंचकर उनका हाथ थाम लिया और अपने रथ पर बिठाकर द्वारका की ओर चल पड़े , भगवान श्री कृष्ण रुकमणी को द्वारका ले जाकर उनके साथ विधिवत विवाह किया। इस दौरान कथा में सम्मिलित लोगों ने भगवान श्रीकृष्ण और रुखमणीजी के विवाह में उपहार भेंटकर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस कथा का श्रवण करने असंख्य भक्त जन कथा पंडाल पहुंच रहे हैं। षष्ठम दिवस के कथा में कामधेनु सेना के छत्तीसगढ़ प्रदेशाध्यक्ष और आदर्श श्रमजीवी पत्रकार संघ के उड़ीसा प्रांत के प्रदेशाध्यक्ष अरविन्द तिवारी एवं छत्तीसगढ़ कामधेनु सेना के सचिव योगेश तिवारी विशेष रूप से उपस्थित थे। यह श्रीमद्भागवत कथा प्रतिदिन दोपहर दो बजे से हरि इच्छा तक चल रही है। राष्ट्रीय गो सेवा संगठन कामधेनु सेना के संगठन मंत्री आकांक्षा शर्मा एवं जिला प्रवक्ता अंजू शर्मा ने सभी श्रद्धालुओं से कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुये कथा श्रवणकर अक्षय पुण्य के भागी बनने की अपील की है।

















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