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Friday, December 17, 2021

भगवान ने यमुना को दिलायी कालिया नाग से मुक्ति

 

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

जांजगीर चांपा - आज श्रीमद्भागवत कथा में किशी वृंदावन से पधारे पं० विश्वकांताचार्य जी महाराज ने हनुमान धारा रोड चांपा स्थित दामोनंद निक भवन में श्रद्धालुओं को कालिया उद्धार कथा श्रवण कराते हुये बताया एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने चले आये। यमुना के तट पर आकर गौओं  ने उस विषाक्त जल को पी लिया , जिसे नागराज कालिय ने अपने विष से दूषित कर दिया था। उस जल को पीकर बहुत-सी गायें प्राणहीन होकर पानी के निकट ही गिर पड़े। यह देख सर्वपापहारी साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण का चित्त दया से द्रवित हो उठा। फिर वे तटवर्ती कदम्बवृक्षपर चढ़ गये और उसकी ऊँची डाल से उस विष-दूषित जल में कूद पड़े। यमुना में कालियनाग रहता था। वह क्रुद्ध होकर माधव को डॅसते हुये अपने शरीर से उन्हें आच्छादित कर लिया। तब श्रीकृष्ण अपने शरीर को बड़ा करके उसके बन्धन से छूट गये और उस सर्प को एक मुक्का मारा।श्रीकृष्ण के मुक्के की चोट खाकर वह सर्प मूछित हो अपनी सुध-बुध खो बैठा।

 तदनन्तर अपने सौ मुखों को आनत करके वह श्रीकृष्ण के सामने स्थित हुआ। श्रीकृष्ण उन फनों पर चढ़ गये और मनोहर नट-वेष धारण करके नट की भाँति नृत्य करने लगे। उस समय नटराज की भाँति सुन्दर ताण्डव करने वाले श्रीकृष्ण के ऊपर देवता लोग फूल बरसाने लगे और प्रसन्नतापूर्वक वीणा , ढोल , नगारे तथा बाँसुरी बजाने लगे। ताल के साथ पदविन्यास करने से श्रीकृष्णने लम्बी साँस खींचते हुये महाकाय कालिया के बहुत-से उज्ज्वल फनों को भग्न कर दिया। उसी समय भयसे विह्वल हुई नागपत्नियाँ आ पहुँची और भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में नमस्कार करके गदगद वाणी द्वारा इस प्रकार स्तुति करने लगीं-भगवन् ! आप परिपूर्णतम परमात्मा तथा असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति हैं। आप गोलोकनाथ श्रीकृष्णचन्द्र को हमारा बारम्बार नमस्कार है। व्रज के अधीश्वर आप श्रीराधावल्लभ को नमस्कार है। परमदेव ! आप इस नाग की रक्षा कीजिये , रक्षा कीजिये। तीनों लोकों में आपके सिवा दूसरा कोई इसे शरण देनेवाला नहीं है। 

आप स्वयं साक्षात् परात्पर श्रीहरि हैं और लीला से ही स्वच्छन्दतापूर्वक नाना प्रकार के श्रीविग्रहों का विस्तार करते हैं। अब तक कालियनाग का गर्व चूर्ण हो गया था। नाग पत्नियों द्वारा किये गये इस स्तवन के पश्चात् वह श्रीकृष्ण से बोला-'भगवन् ! पूर्ण काम परमेश्वर ! मेरी रक्षा कीजिये।' 'पाहि-पाहि' कहता हुआ कालियनाग भगवान् श्रीहरिके सम्मुख आकर उनके चरणों में गिर पड़ा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उससे कहा- तुम अपनी पत्नियों और  सुहृदों के साथ रमणक द्वीप में चले जाओ। तुम्हारे मस्तक पर मेरे चरणों के चिह्न बन गये हैं , इसलिये अब गरुड तुम्हें अपना आहार नहीं बनायेगा। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने यमुना को कालिया नाग से मुक्ति दिला दिलायी। इसके अलावा महाराजश्री ने भगवान श्रीकृष्ण के अनेकों बाल लीलाओं का भी वर्णन किया।

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