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Friday, September 30, 2022

अभिनेत्री आशा पारेख हुई दादासाहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट


नई दिल्ली -  कई हिंदी फिल्मों में अपने बेहतरीन किरदार के लिये पहचानी जाने वाली मशहूर अभिनेत्री आशा पारेख( 79 वर्षीया) को आज नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत का सर्वोच्च फिल्म सम्मान 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। कोरोना महामारी के कारण पिछले दो सालों से नेशनल अवार्ड का आयोजन नहीं किया गया था। दादा साहेब फाल्के अवार्ड 2020 उन्हें नई दिल्ली में हुये 68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा दिया गया है। यह अवार्ड भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान होता है। दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड मिलने के बाद आशा पारेख ने कहा कि यह भारत सरकार से मुझे मिलने वाला सबसे अच्छा सम्मान है। मेरे 80वें जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले मुझे यह सम्मान मिला, मैं इसके लिये आभारी हूं और जूरी को इस सम्मान के लिये धन्यवाद देना चाहती हूं। भारतीय फिल्म जगत को 'बेहतरीन स्थान' बताते हुये उन्होंने कहा कि वे 60 साल बाद भी फिल्मों से जुड़ी हुई हैं। बाल कलाकार के तौर पर अपने करियर की शुरुआत करने वाली पारेख ने कहा हमारा फिल्म जगत सबसे अच्छी जगह है। और मैं इस जगत में युवाओं को दृढ़ता, दृढ़ संकल्प, अनुशासन और जमीन से जुड़े रहने का सुझाव देना चाहती हूं, और मैं आज रात पुरस्कार पाने वाले सभी कलाकारों को बधाई देती हूं। 

अभिनेत्री आशा पारेख को वर्ष 2020 के लिये भारतीय सिनेमा का यह शिखर पुरस्कार मिलना और भी बड़ी बात है, क्योंकि भारत सरकार ने 37 साल बाद किसी फ़िल्म अभिनेत्री को फाल्के सम्मान दिया है। पिछली बार वर्ष 1983 के लिये अभिनेत्री दुर्गा खोटे को यह सम्मान मिला था, अन्यथा फाल्के पुरस्कार पर अधिकतर पुरुषों का वर्चस्व रहा है।इस फाल्के पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1969 में अभिनेत्री देविका रानी के साथ हुई थी , जब 1970 में 17 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में देविका को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, लेकिन बाद में पुरुष ही इस पुरस्कार को ज्यादा पाते रहे हैं। जहां तक किसी महिला को फाल्के सम्मान मिलने की बात है तो कोई महिला फिर 22 साल बाद फाल्के सम्मान से पुरस्कृत हुई है। दिलचस्प यह है कि वर्ष 2000 में भी फाल्के सम्मान  गायिका आशा भोसले को मिला था और अब भी अभिनेत्री आशा पारेख को मिला है।

                गौरतलब है कि गुजरात में 02 अक्तूबर 1942 को जन्मी आशा पारेख के पिता बच्चूभाई पारेख एक हिन्दू गुजराती परिवार से थे, जबकि उनकी माँ सुधा उर्फ़ सलमा एक मुसलमान परिवार से थीं। बचपन में ही आशा पारेख ने क्लासिकल डांस सीखना शुरू कर दिया था। वर्ष 1952 में 10 साल की उम्र में ही उन्हें बाल कलाकार के रूप में एक फ़िल्म मिल गई थी, जिसका नाम था 'माँ'। दरअसल फ़िल्मों में जब उस दौर के मशहूर फ़िल्मकार बिमल रॉय ने बेबी आशा के एक डांस को देखा तो उन्हें अपनी फ़िल्म 'माँ' में एक भूमिका दे दी। इस फ़िल्म में भारत भूषण, लीला चिटनिस और श्यामा मुख्य भूमिकाओं में थे। यहीं से आशा का फ़िल्मों में शौक़ जागा. इसके बाद बाल कलाकार के रूप में आशा ने आसमान, धोबी डॉक्टर, बाप बेटी, चैतन्य महाप्रभु, अयोध्यापति और उस्ताद जैसी कुछ और फ़िल्में भी की। एक बार कलाकार के रूप में अपना केरियर शुरू करते हुये उन्होंने 95 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है , जिसके लिये उन्हें कई अवार्ड मिल चुके हैं। वर्ष 1971 में उन्हें फिल्म कटी पतंग के लिये फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला था। इसके अलावा उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। आशा पारेख भारत के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानि सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। उन्हें फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने उन्हें लिविंग लीजेंड अवॉर्ड से भी सम्‍मानित किया है। अब वे फिल्‍मों से दूर मुम्बई में अपनी एक डांस एकेडमी चलाती हैं। इसके अलावा मुंबई के ही सांता क्रूज इलाके में आशा पारेख अस्पताल का भी काम देखती हैं। आशा पारेख की सुपरहिट फिल्‍मों में ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘फिर वही दिल लाया हूं’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘बहारों के सपने’, ‘प्यार का मौसम’, ‘कटी पतंग’ और कारवां शामिल हैं। हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने गुजराती , पंजाबी और कन्नड फिल्मों में भी काम किया है। आशा पारेख ने फिल्मों में अभिनय के अलावा निर्देशक और निर्माता की भूमिका में भी भारतीय सिनेमा को समृद्ध किया। उन्होंने सिनेमा और नृत्यकला प्रेमियों के मन पर एक कुशल भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना के रूप में भी अपनी अमिट डाली है।

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