रिपोर्टर बैजनाथ पटेल बेलगहना
बेलगहना स्वामी श्री शिवानंद जी महाराज सात दिवसीय दक्षिण भारत अपने भक्तो के साथ पूर्ण किए,यात्रा बेलगहना आश्रम से शुरुआत करते हुऐ सर्वप्रथम चेन्नई(मद्रास) पहुंचे जहां पर कपालेश्वर मंदिर का दर्शन किए,मायलापुर में स्थित कपालेश्वर मंदिर चेन्नई के प्रसिद्ध मंदिर में से एक है। चेन्नई शहर के धार्मिक स्थल, न केवल भक्तो और धार्मिक श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने है बल्कि कला और इतिहास प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बने हुए है। इसके बाद रामेश्वरम गए, जहां पर समुद्र मे स्नान कर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किए।रामेश्वरम हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ है। यह तीर्थ हिन्दूओं के चार धामों में से एक है।इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।भारत के उत्तर में काशी की जो मान्यता है,वही दक्षिण में रामेश्वरम की है।यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारो ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार का द्वीप है।फिर यहां से धनुषकोडी व रामसेतु गए। रामायण काल में यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था।
इसकी लंबाई १०० योजन व चौड़ाई १० योजन थी। इसे बनाने में श्री राम नाम के साथ, उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था। यहां समुद्र का नजारा अपने आप ही पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां से आगे बढ़ाते हुए,कन्याकुमारी पहुंचे जहां पर स्वामी विवेकानंद जी का ध्यान स्थल है। जो की समुद्र के अंदर टापू में स्थित है।कन्याकुमारी हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। यह पृथ्वी पर एकमात्र ऐसी जगह है, जहां आप समुद्र से उगते सूरज और डूबते सूरज को देख सकते हैं । यह भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहां पूर्णिमा के दिन एक साथ सूर्यास्त और चंद्रोदय के अनोखे नजारे का आनंद लिया जा सकता है।देवी कन्याकुमारी को समर्पित, कुमारी अम्मन मंदिर 3000 साल से अधिक पुराना है, जो एक प्रभावशाली वास्तुकला प्रस्तुत करता है। यहां से फिर आगे मदुरै गए। जहां पर स्वामी शिवानंद जी महाराज एवं भक्तो ने मीनाक्षी मंदिर का दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किए।मदुरै शहर के केंद्र में स्थित, मीनाक्षी-सुंदरेश्वर मंदिर भगवान शिव की पत्नी देवी मीनाक्षी को समर्पित है। यह मन्दिर तमिल भाषा के गृहस्थान 2500 वर्ष पुराने मदुरई नगर, की जीवनरेखा है।इस मंदिर की परिक्रमा करने में एक अलग ही आनंद है, यहां की चारो प्रमुख द्वार को देखने में ऐसा लगता है मानो उसे देखता ही रहूं।इस यात्रा की अंतिम पड़ाव तिरुपति बालाजी में जा कर संपन्न हुआ। तिरुमला पर्वत पर स्थित है, यह भारत के मुख्य तीर्थ स्थलों में से एक है। तिरुपति बालाजी का वास्तविक नाम श्री वेंकटेश्वर स्वामी है जो स्वयं भगवान विष्णु हैं।उनका दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किए।यह माना जाता है कि भगवान विष्णु ने इस कलियुग के दौरान अपने भक्तों को मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करने और निर्देशित करने के लिए इस मंदिर में स्वयं को प्रकट किया था । ऐसा कहा जाता है कि भगवान वेंकटेश्वर की मुख्य मूर्ति इतनी अनोखी और शक्तिशाली है। आकर्षक मूर्ति में कई चमत्कारी विशेषताएं हैं जो अद्भुत हैं।यहां से यात्रा को विराम देते हुए पुनः बेलगहना आश्रम के लिए प्रस्थान किए, जहां बिलासपुर स्टेशन में कुरेली, सांवाताल, लोरमी, बेलगहना,के भक्तो के द्वारा स्वामी जी का फूल माला के साथ स्वागत किया गया।



















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