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Thursday, December 19, 2024

नंदावत पूस के गोठ बात कोनो बिशेष बात ला लिखे ले पहिली ओखर पाछू (भूत), चलत (वर्तमान)अउ, अवइया बेरा (भविष्य) के बारे मा चिंतन मनन करे ला पड़ थे नंदावत पूस के गोठ बात आप मन ला पढ़े मा अलकारहा लाग ही ये कइसन विषय हरे खैर अपन बात ला आओ शुरू करन काबर सियान मन के हे पूस बीते फूस फूस।

 नंदावत पूस के गोठ बात




              कोनो बिशेष बात ला लिखे ले पहिली ओखर पाछू (भूत), चलत (वर्तमान)अउ, अवइया बेरा (भविष्य) के बारे मा चिंतन मनन करे ला पड़ थे नंदावत पूस के गोठ बात आप मन ला पढ़े मा  अलकारहा लाग ही ये कइसन विषय हरे खैर अपन बात ला आओ शुरू करन काबर सियान मन के हे पूस बीते फूस फूस।

           धान पान कांटे के बाद अपन _अपन बियारा खलिहान मा सकेल के राख दे वे। ओन्हारी लाखड़ी ,चना, गेहूं,मसूर ला तो धनहा खेत मा मूठा मा छित_ छित के बोएं, कोनो _कोनो मन नागर मा बोएं ,धान लूए ला जाए ता बेंदरा बरोबर खन _खन के खाए, अउ ओली _ओली टोर के अपन _अपन घर घलों लाएं, किसान मन बड़ चतुरा घलों  हो थे अपन खेत के भाजी , राहेर ला छोड़ के दुसर के खेत मा हाथ लमाएं ला नइ छोड़े, साँझ कन भाटा अउ दार डार के लस_ लस ले रांधे, जेन ला सुक्खा मिरचा, लहसुन मा बघारे पारा भर खांस _खांस के जान डरे, बखरी के चिरपोटी पताल बंगाला, महामावत धनिया, लहसुन के चटनी, बात मा खोचें हरियर मिरचा, अंगरा मा भूंजे सुक्खा लाल मिरचा, तावा पाना के अंगाकर रोटी, चीला रोटी  के बात ही अलग राहे, चना भाजी बर तो सियान मन एक ठन बात के हे कि चना भाजी चन के,खाले बेटा मन के ।

       साँझ के बेरा सब झन सकला के आरी _पारी खांसर _कोल्लर, गाड़ा_ बइला,दउरी फांद के मिन्जे बर पैर डाले खाए के पहली एक बार अउ खाए के बाद दुसर पैरा ला पलटी करे,काम करत अपन _अपन सुख दुख के बात ला गोठियाय। दू चार झन सियान अउ लइका मन दू तीन दिन बियारा मा गाड़ा खांसर के कुंदरा बना के रात भर भुर्री बार के सोए ओमन दू बात बोले लक्ष्मी ला अकेल्ला नइ छोड़ना हे दुसर कोनो चुरा झन ले जाए। पहाती चार बजे उखर गाड़ी चले बिहानियां चाय पी के पैरा फेंके , रास ला सकेले, पैरा भूंसा ला हटा के ओखर पूजा पाठ कर के सबला हिस्सा दे के।सांझ कन बढ़ौना भात के साथ न्यौता राहें सादा वाले मन बर सादा खीर पूड़ी,भजिया आदि अउ रंगीन वाले मन बर रंगीन कूकरी, मछरी, दारू राखे। अब तो आँखी झपकत सबो काम झिन भर मा हो जावत हे।

          किसान के काम अउ किसानी बुता तो कभू नई सिराय जीयत ले मरत तक चलत रहिथे अपन काम करत भगवान के नाम लेवत रहिथे ।बने बने फसल हो थे ता खुशी मंगल घलों मना थे अपन घर परिवार मा बाढ़े लोग लइका के बर बिहाव, घर मा पूजा पाठ करवा थे रंग_ रंग के गहना बनवा थे, जमीन बिसा ले थे। फेर सार्वजनिक जीवन मा घलो पाछु नई राहें गांव भर के मनखे जुरिया के गांव मा मनोरंजन बर मड़ई मेला नाच गाना  के आयोजन करत रहिथे।आधुनिक दुनियां मा जीवन जीयत हे फेर अपन संस्कृति कला ला नई भुलाए हे गांव गांव मा रामायण, जस प्रतियोगिता, गीता ,भागवत, सतसंग के आयोजन करत रहिथे।जांगर वाले कोनो_ कोनो मनखे मन चार महिना बर अपन घर परिवार ले दूरिहा के ठेकादारी,रोजी मजदूरी, ईटा भट्ठा खाए कमाएं बर बड़े _बड़े  शहर कोती घलों जा थे। फेर सरकार के बदलत नीति नियम मा गांव के मनखे ला रोजगार गारंटी मा काम मिलत हावे घर परिवार के बीच मा काम अउ पइसा मिल जावत हे। जेन लइका मन के पढ़ाई लिखाई दाई ददा के बाहिर जाए ले बीच मा छूट जावत रीहिस तेमा सुधार आगे जेखर सेती स्कूल कालेज मा पढ़ लिख के नाम कामावत हे।अपन घर परिवार, समाज, जिला, प्रदेश अउ देश के नाम ला आगू बढ़ावत हे।काबर  केहे घलो गेहे जेन पढ़ही तेन आगू बढ़ही। बाबू मन ले जादा नोनी मन आगू बढ़त हावे।बाबू मन पढ़ थे एक कुल के नाव आगू बढ़ थे अउ नोनी मन पढ़ थे ता दू कुल के नाव आगू बढ़त रहिथे। 

        पुराना जुन्ना सियान मन ठंड ले बांचें बर पूस महीना मा छेना भूसा के गोरसी लकड़ी, संडेवा काड़ी,अमारी काड़ी,चरोटा,बड़े _बड़े लकड़ी के अंगेठा भुर्री बारे । चार झन बइठ के सुख दुख गोठियाय।ठंड ले बांचें बर जुन्ना कथरी, कमरा के गठरी ला निकाले ।अपन तीर तार मा  बइठे कुकुर ,बिलई  पीला ला घलो बइठारे। रधनी कुरिया डाहर हांका देवत लाली, करिया, धौरी गाय के हरदी डारे गरम दूध ला मंगवा के मिल बाँट के पिएं। होवत बिहानियां गाय दुहे बर पाहटिया  नइ आवे ।चोंगी बीड़ी माखुर वाले बबा मन अब नई दिखे ।अब तो पक्की पक्की घर द्वार के बने ले गाय गरवा घलों नंदावत हे अब तो पानी जावत पनिहारिन अउ खेत ले आवत खेतिहारीन आगी मांगे बर घलों नई आवे।दाई ददा अउ गरवा ला निकाल के विदेशी कुकुर ला पालत हावे। गोठ करबो ता बहुत अकन हो जाहि।फेर जमाना बदलगे आज कल तो गरम स्वेटर, चादर, रजाई, टोपी, जैकेट, इनर,हाथ पाँव के मोजा, ए सी मशीन के उपयोग करत हावे।बदलत हन कहिके नवा नवा जवान लइका मन खुले आम दारू,गांजा, तम्बाकू,गुटखा के नशा पानी करके जीवन ला नरक बनावत हे।

       बदलना प्रकृति के नियम आए  गरमी, सर्दी, बरसात, पतझड़, हरियाली, सुख दुख,जीवन मरन जीवन मा आवत जावत रहिथे कोनो गलत बात नइ हे, फेर अतका झन बदलव कि जादा के चक्कर मा खुद ले दूरिहा जावव तहान फेर अपन खुद के संस्कृति, दाई ददा,परिवार,सामाजिक जीवन हा गरू लागे लगे।

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