जिला सिवनी मध्यप्रदेश
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'किसान कल्याण' की आड़ में किसानों की लूट: सिवनी का महाघोटाला और कानून की विफलता
सी एन आई न्यूज सिवनी जिले में हुए लखनादौन सहकारी समिति के 100 करोड़ के महाघोटाले ने 'किसान कल्याण' के नाम पर चल रहे पाखंड का पर्दाफाश कर दिया है। यह कहानी सिर्फ एक स्थानीय खबर नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि कैसे सरकारी योजनाओं के भीतर ही भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। एक साधारण बस कंडक्टर जैसा व्यक्ति, प्रबंधक तुलसीराम डेहरिया, 100 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लेता है, जो इस पूरी व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।
'कुचिया' व्यापारियों का उदय और किसानों का शोषण
पिछले एक दशक में जहाँ किसानों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ, वहीं कुछ छोटे व्यापारी रातों-रात करोड़पति बन गए। लखनादौन का घोटाला इसका ज्वलंत उदाहरण है। जहाँ सरकार ने मूंग का समर्थन मूल्य ₹8,682 तय किया था, वहीं प्रबंधक तुलसीराम डेहरिया ने बड़े व्यापारियों के साथ मिलकर बाजार से ₹5,500 से ₹6,000 की घटिया मूंग खरीदी और उसे किसानों के नाम पर सरकारी खातों में दर्ज किया। इस साजिश में भोला-भाला किसानों को प्रति क्विंटल ₹200 का लालच दिया गया। इससे भी बुरा यह है कि ये लोग फर्जी 'सिकीमीनामा' बनाकर उन किसानों के नाम पर भी फर्जी रजिस्ट्रेशन कर लेते थे, जिनकी जमीन पर कभी मूंग बोई ही नहीं गई।
यह जानकर हैरानी होती है कि जहाँ जिले में बमुश्किल 1,000 क्विंटल मूंग की फसल पैदा होती है, वहीं अकेले लखनादौन में ₹37 करोड़ की मूंग खरीदी गई। इसका सीधा जवाब है - कोई फसल उगी ही नहीं, यह पूरा घोटाला सिर्फ कागजों पर किया गया।
सरकारी योजनाएं बनी लूट का जरिया
इस घोटाले की सबसे दर्दनाक बात यह है कि इसमें हर उस सरकारी योजना को निशाना बनाया गया, जो किसान के लिए जीवन रेखा मानी जाती है। चाहे वह 2018 की कर्ज माफी हो या 2023 की ब्याज माफी, दोनों ही योजनाओं में किसानों के नाम पर पैसों की हेराफेरी की गई। फसल खराब होने पर मिलने वाली बीमा राशि को भी बेरहमी से हड़प लिया गया। यह सिर्फ वित्तीय अपराध नहीं, बल्कि किसानों के मनोबल पर किया गया सीधा हमला है।
भ्रष्टाचार की 'सेना' और राजनीतिक संरक्षण
यह हैरान करने वाला है कि 25,000 रुपये मासिक कमाने वाला एक व्यक्ति 100 करोड़ का मालिक कैसे बन सकता है। सूत्रों की मानें तो उसने अपने रिश्तेदारों के नाम सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि और आलीशान संपत्ति खरीद रखी है। यह 'मास्टरमाइंड' अकेले काम नहीं करता, बल्कि उसने बिना अपेक्स बैंक की अनुमति के 20-25 लोगों को फर्जी तरीके से भर्ती कर अपनी खुद की एक 'सेना' खड़ी की है। यह भ्रष्ट सिंडिकेट बड़े-बड़े उच्च अधिकारियों को रिश्वत देकर, भ्रष्टाचार की बहती हुई नदी को भी अपने रास्ते से मोड़ देता है।
सूत्रों के अनुसार, शिकायतकर्ताओं और पत्रकारों को खुलेआम धमकी दी जा रही है और उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाने की कोशिश की जा रही है ताकि उनका भ्रष्टाचार छिपा रहे।
'लूट' पर रोक लगाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे
इस तरह के घोटाले कई चरणों में होते हैं:
फर्जीवाड़ा: किसानों के नाम पर नकली पंजीकरण, घटिया माल की खरीद और फर्जी नियुक्तियाँ।
सांठगांठ: आदिम जाति सेवा सहकारी बैंक से लेकर वेयरहाउस और कृषि विभाग तक, हर स्तर पर अधिकारियों की मिलीभगत।
राजनीतिक संरक्षण: बड़े नेताओं और अधिकारियों को उपहार देकर या पर्दे के पीछे के प्रभाव से जांच को दबाना।
इस 'लूट' को रोकने के लिए कुछ कठोर कदम उठाने होंगे:
डिजिटलीकरण और पारदर्शिता: सभी किसान-संबंधित योजनाओं में पूर्ण पारदर्शिता लाई जाए। पंजीकरण, खरीद, और भुगतान को ब्लॉकचेन जैसी सुरक्षित तकनीक से जोड़ा जाए और किसानों को सीधे उनके बैंक खाते में DBT (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) के माध्यम से भुगतान किया जाए।
कठोर ऑडिट और निगरानी: सहकारी समितियों और सरकारी विभागों का नियमित और स्वतंत्र ऑडिट हो। EOW और अन्य जांच एजेंसियों को राजनीतिक दबाव से मुक्त कर उन्हें ऐसे मामलों की जांच करने के लिए सशक्त बनाया जाए।
व्हिसलब्लोअर और मीडिया प्रोटेक्शन: ऐसे मामलों को उजागर करने वाले पत्रकारों और व्हिसलब्लोअर को सुरक्षा दी जाए ताकि वे बिना किसी डर के जानकारी दे सकें।
दोषियों पर त्वरित कार्रवाई: जब तक तुलसीराम डेहरिया जैसे 'मास्टरमाइंड' खुलेआम घूमते रहेंगे, तब तक किसी को कानून का डर नहीं होगा। दोषियों को तुरंत गिरफ्तार कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि एक मजबूत संदेश जाए।
यह मामला पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। जब तक ऐसे 'मास्टरमाइंड' खुलेआम घूमते रहेंगे और उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक सहकारिता सिर्फ एक छलावा बनकर रह जाएगी और किसानों की 'लूट' जारी रहेगी।
जिला सिवनी से छब्बी लाल कमलेशिया की रिपोर्ट


















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