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Sunday, January 11, 2026

दंतेवाड़ा के बैलाडीला भांसी डिपॉजिट-4 में प्लांट खोलने की कोशिश को आज आदिवासियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। भांसी पंचायत में बुलाई गई आमसभा में 25 पंचायतों के हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर एनसीएल के अधिकारियों को खरी-खरी सुना दी।

 लोकेशन – दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़


रिपोर्ट – असीम पाल दंतेवाड़ा





दंतेवाड़ा के बैलाडीला भांसी डिपॉजिट-4 में प्लांट खोलने की कोशिश को आज आदिवासियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा।

भांसी पंचायत में बुलाई गई आमसभा में 25 पंचायतों के हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर एनसीएल के अधिकारियों को खरी-खरी सुना दी। 




ग्रामीणों के सवालों के आगे एनसीएल के अधिकारी बेबस नजर आए और बिना जवाब दिए बेरंग लौट गए।


बैलाडीला डिपॉजिट-4 में खनन प्लांट खोलने को लेकर भांसी पंचायत में आमसभा आयोजित की गई थी। इस सभा में दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले की 25 पंचायतों के ग्रामीण शामिल हुए।




 एनसीएल के अधिकारी भी सभा में मौजूद थे, लेकिन जैसे ही ग्रामीणों ने विकास, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर सवाल पूछे—अधिकारी निरुत्तर हो गए।


ग्रामीणों का कहना है कि

एनएमडीसी के आने के बाद से वे पिछले 70 सालों से खून की तरह लाल पानी पीने को मजबूर हैं। आज तक न कंपनी और न ही प्रशासन इस समस्या का समाधान कर सका।




पहाड़ के पीछे बसे गांवों में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।



पहले विकास दो, पहले स्कूल और अस्पताल दो…

उसके बाद प्लांट की बात करना।

हम सब्ज़ बाग नहीं समझते।”


ग्रामीणों ने साफ कहा—

पहले शिक्षा, स्वास्थ्य और शुद्ध पानी की व्यवस्था हो, तभी किसी भी तरह के प्लांट की अनुमति दी जाएगी। बिना ग्रामसभा की मंजूरी के एक इंच जमीन भी नहीं दी जाएगी।



ग्रामीणों और युवाओं ने बेहद सख्त चेतावनी दी।

उनका कहना है—

“यह पहाड़ हमारे लिए देवता है, हमारी जीवनशैली है।” इस पहाड़ी में आदिवासियों के कुल देवी-देवताओं का वास है।

यही नहीं, यह इलाका बाघ और अन्य वन्य प्राणियों का विचरण क्षेत्र भी है।


ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि

सरकार और कंपनी मिलकर एक जैव विविधता से भरपूर पहाड़ को उजाड़ने की साजिश कर रही है। जबकि हाल ही में इस इलाके में बाघ की मौजूदगी की पुष्टि भी हो चुकी है।


(युवाओं की चेतावनी)


गांव के युवाओं ने कहा—

“हमारे दादाओं ने हथियार नहीं छोड़े हैं।

अगर पहाड़ पर नजर डाली गई,

तो हम फिर हथियार उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।” यहां तक कि चेतावनी दी गई कि

बिना ग्रामीणों की सहमति के प्लांट खुला

तो बस्तर की स्थिति असम और नेपाल जैसी बन सकती है।


आदिवासियों के इस कड़े विरोध के आगे

एनसीएल के अधिकारी एक भी सवाल का जवाब नहीं दे पाए और आमसभा से बेरंग लौट गए।


अब सवाल यह है—

क्या सरकार आदिवासियों की आवाज सुनेगी

या फिर बैलाडीला की पहाड़ियों पर टकराव और बढ़ेगा?

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