श्रीराम के जीवन का अनुकरण और श्रीकृष्ण का अनुसरण करें - पं कृष्णा महराज
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
सूरजपुर - अवतार तो प्रभु ने अनेकों लिये हैं किन्तु राम और कृष्ण की जीवनी ही इतनी महानतम हुई कि श्रीराम और श्रीकृष्ण कहते हैं। यही अपने जीवन में अगर हम अपना सके तो हमारे साथ भी श्री होंगी यानि लक्ष्मी सदैव हमारा साथ देंगी। परिस्थितियां कोई भी रही हो राम राजगद्दी छोड़े , आभूषण वस्त्र छोड़े , माता पिता छोड़े , अयोध्या छोड़े , किन्तु धनुष नहीं छोड़े। सनातन की रक्षा के लिए और दुष्टों के संहार को शस्त्र चाहिए। यही तो श्रीराम बनने की पहली सीढ़ी है कि हम धर्म को पहले क्रम में रखें। शास्त्र अध्ययन को गये वहां भी ताड़का जैसे दुष्टों से यज्ञ की रक्षा किए। आज हम यज्ञ की तरफ देखते भी नहीं आयोजन और रक्षा को तो दूर की बात बना लिये। हमें अपने धर्म को सर्वोपरी बनाना होगा तभी तो राम बन पाएंगे या राम कृष्ण जैसे संतान आयेंगे।
उक्त बातें श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस बैजनाथपुर (बनियाटिकरी) भैयाथान में निःशुल्क भागवत प्रवक्ता कृष्णा जी महराज ने कही। उन्होंने कहा आज तो हम सब सेवा को नकार कर केवल अर्थ लोलुपता जीवन बनाते चले जा रहे हैं , अर्थ कमाना अत्यंत आवश्यक है किन्तु उसका सदुपयोग हो और पहला उपयोग धर्म कार्य के लिए होनी चाहिये। हनुमान जी का मंदिर ही इस धरा ज्यादा क्यों बने यह समझना होगा , इनके आराध्य श्रीराम से भी ज्यादा हनुमान के मन्दिर क्यों हैं ? क्योंकि धर्म की सेवा और अपने आराध्य की सेवा पूर्ण निस्वार्थ भाव से करने जज़्बा तो केवल बजरंगबली में ही हो सकता है। इसलिए माता पिता गुरु और सनातन धर्म इनकी सेवा निस्वार्थ भाव करनी शुरू करना होगा , जब हम हनुमान के जीवन का अनुकरण करना शुरू करेंगे तभी तो श्रीराम के जीवन की ओर बढ़ सकेंगे। महाराजश्री ने बताया राम एक शब्द में राजगद्दी छोड़ वन को जाने उठ खड़े हुए कोई दूसरा विचार नहीं कि मेरा हक मेरा हिस्सा कहां। पिता आज्ञा है मानूंगा बस यही विचार और वल्कल पहन वन को प्रस्थान किए। हमारा विचार भी माता पिता की सेवा में कोई अवरोध ना बने अनवरत सेवा में लगा रहे , यही सीख राम कथा से लेनी होगी। व्यासाचार्य ने बताया श्रीमद्भागवत कथा में राम कथा इसलिए आता है क्योंकि कृष्ण चरित्र को अगर पूरा समझना है तो पहले राम के चरित्र को जानना चाहिए। राम कैसे श्रीराम या मर्यादा पुरुषोतम राम बने यह समझना ही होगा। अगर यहां कमी हुई समझने में तो भांति भांति के विचार कृष्ण चरित्र पर उठेगा , फिर जहां पुण्य हेतु कथा श्रवण कर रहे वहां अपराध उत्पन्न होगा। श्री कृष्ण जन्मोत्सव का योग बनाने पूरा चंद्रवंश जतन किया। अपने चरित्रों को साध कर ही भगवान हमारे कुल में जन्म लेंगे। यह कितने पीढ़ियों का प्रताप इकठ्ठा होगा तब योग बनता है। एक और विशेष बात ध्यान रखनी होगी कि श्रीराम जी का जन्म दिन के बारह बजे हुआ और श्री कृष्ण जी का मध्यरात्रि बारह बजे क्यों , यह बहुत मायने रखता है। क्योंकि हमारा परिवार , हमारे विचार और हमारा व्यवहार यह सब एक होंगे तभी तो योग बने भगवान के जन्म का। घड़ी की सुइयां बता रही एक मत हो जाओ पूरा परिवार , सबके विचार और सबका व्यवहार। ठीक बारह बजे सभी सुइयां एक जगह होती हैं , ये बता रही की जब सब एक हो जाओगे तभी प्रभु आयेंगे। प्रभु को पाना बड़ा ही आसान है बस कठिन है उनसे प्रेम करना और पहले उनसे प्रेम निभाना ही तो पड़ेगा , जब अनवरत प्रेम करेंगे तो प्रभु हमारे पास हमारे सामने होंगे। बस प्रेम चक्षु खोलनी है। महाराजजी ने आगे कृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग कहते हुए कहते हैं, जैसे देवकी वसुदेव भगवान की प्रतिक्षा करते हुए सात पुत्रों को गवां कर भी नाम स्मरण करना नहीं छोड़े , उनका विश्वास तनिक भी नहीं डोला , उनको भगवान आयेंगे इस पर पूरा विश्वास अंत तक रहा वैसे ही हमको भी प्रभु कृपा करेंगे यह विश्वास को तनिक भी डिगने नहीं देना है। अगर ऐसा कुछ प्रारंभ कर लिए करना की "कृपा वो करेंगे कभी न कभी" तो यकीन मानिए प्रभु की कृपा भी होगी और जीवन संवर जाएगा। नाम जप, नाम स्मरण, लीला श्रवण और अपने जीवन में आदर्शो का अनुकरण यही कर लें तो प्रभु भक्ति मिलेगी ही मिलेगी। अपने रिश्ते नातों को निभाते हुए ही प्रभु को पाना है , अपने दैनिक कार्य करते हुए ही नाम जपना है , गृहस्थ होते हुए संत बन प्रभु से मिलना है और यही श्रीमद्भागवत का मूल है। कथा में भक्तों ने प्रभु श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की झांकी और भंडारे का भी भरपूर आनन्द उठाया।


















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