समीक्षा -
छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की आत्मा का साहित्यिक छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह - अनोखी बहू
- डुमन लाल ध्रुव
छत्तीसगढ़ी साहित्य की परंपरा लोकजीवन, लोकसंस्कृति और लोकभाषा से गहराई से जुड़ी रही है। इसी परंपरा को सशक्त रूप में आगे बढ़ाने वाले रचनाकारों में कमलेश प्रसाद शर्मा बाबू का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके द्वारा रचित कहानी-संग्रह अनोखी बहू छत्तीसगढ़ के ग्रामीण समाज, उसकी सोच, उसकी कमजोरियों और उसकी मानवीय संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज है। इस संग्रह में शामिल कहानियां केवल मनोरंजन नहीं करती पाठक को समाज के भीतर झांकने और आत्ममंथन करने के लिए विवश करती है।
इस संग्रह की कहानियां छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में लिखी गई है जो इन्हें विशेष प्रामाणिकता प्रदान करती है। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बल्कि यहां जीवन-दर्शन बन जाती है। अनोखी बहू, जरहा बीड़ी, बांके बढ़ई, मनौति अउ पनौति, अति-अंधविश्वास, भोरहा ऊपर भोरहा, पर भरोसा तीन परोसा, जय भगवान तथा घोर अपराध कहानियों का चित्रण किया गया
संग्रह की शीर्षक कथा अनोखी बहू सामाजिक ढांचे में स्त्री की स्थिति पर तीखा व्यंग्य और करुण दृष्टि प्रस्तुत करती है। यह कहानी उस बहू की कथा है जो पारंपरिक अपेक्षाओं से अलग सोचती है और अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती है। समाज जिसे “अनोखा” कहता है वही वास्तव में आत्मसम्मान और विवेक का प्रतीक बन जाती है।
यह कहानी छत्तीसगढ़ी ग्रामीण समाज में स्त्री के दोहरे संघर्ष को उजागर करती है एक ओर परिवार की मर्यादाएं दूसरी ओर आत्म-अस्तित्व की आकांक्षा। लेखक ने किसी भी प्रकार का उपदेशात्मक स्वर नहीं अपनाया घटनाओं और संवादों के माध्यम से पाठक को सोचने पर मजबूर किया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी शक्ति है।
जरहा बीड़ी कहानी छोटे से प्रतीक के माध्यम से बड़े सामाजिक सत्य को सामने लाती है। ‘बीड़ी’ यहां केवल नशे का साधन नहीं गरीबी, बेबसी और मानसिक थकान का प्रतीक है। कहानी का पात्र बीड़ी पीता है लेकिन असल में वह अपने जीवन की पीड़ा को सुलगा रहा होता है।
इस कहानी में लेखक ने श्रमिक वर्ग के जीवन को बहुत सूक्ष्मता से चित्रित किया है। रोजमर्रा की कठिनाइयां, छोटी-छोटी खुशियां और निरंतर संघर्ष सब कुछ सहज भाषा में उभरता है। यह कहानी पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि नशा केवल व्यक्तिगत दोष नहीं सामाजिक परिस्थिति की उपज भी हो सकता है।
बांके बढ़ई कहानी श्रमिक और कारीगर वर्ग की स्थिति को केंद्र में रखती है। बांके बढ़ई अपने काम में निपुण है लेकिन समाज में उसे वह सम्मान नहीं मिलता जिसका वह हकदार है। यह कहानी श्रम की गरिमा और सामाजिक वर्गभेद पर करारा प्रहार करती है।
लेखक ने बांके के चरित्र को अत्यंत मानवीय रूप में प्रस्तुत किया है उसकी मेहनत, उसका स्वाभिमान और उसका मौन विद्रोह पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ता है। यह कहानी यह भी दिखाती है कि किस प्रकार समाज उपयोगिता के बावजूद कारीगर को हाशिए पर रख देता है।
मनौति अउ पनौति यह कहानी छत्तीसगढ़ी समाज में प्रचलित मनौतियों और पनौतियों की मानसिकता को उजागर करती है। मनौति अउ पनौति में आस्था और अंधविश्वास के बीच की महीन रेखा को बहुत प्रभावी ढंग से दिखाया गया है। कहानी यह बताती है कि किस प्रकार मनुष्य अपनी असफलताओं का कारण पनौति में खोजता है और सफलता का श्रेय मनौति को देता है। लेखक ने इस प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए यह स्पष्ट किया है कि अंधविश्वास किस तरह व्यक्ति की तार्किक सोच को कुंद कर देता है।
अति-अंधविश्वास कहानी नाम के अनुरूप समाज में फैले अंधविश्वास की चरम अवस्था को प्रस्तुत करती है। यहां अंधविश्वास केवल व्यक्तिगत नहीं सामूहिक समस्या के रूप में सामने आता है। लेखक ने दिखाया है कि जब अंधविश्वास सीमा पार कर जाता है तो वह मनुष्य को अमानवीय बना देता है। यह कहानी चेतावनी की तरह है जो पाठक को तर्क, विज्ञान और मानवीय करुणा की ओर लौटने का संदेश देती है।
भोरहा ऊपर भोरहा - यह कहानी शोषण की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया को प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। भोरहा ऊपर भोरहा का अर्थ ही है एक के ऊपर दूसरा बोझ। कहानी में गरीब व्यक्ति किस तरह और अधिक गरीब होता जाता है यह बहुत मार्मिक ढंग से दिखाया गया है। यह कहानी सामाजिक व्यवस्था की विडंबना को उजागर करती है जहां कमजोर हमेशा कमजोर ही बना रहता है। लेखक की दृष्टि यहां अत्यंत संवेदनशील और यथार्थवादी है।
पर भरोसा तीन परोसा - इस कहानी में लेखक ने भरोसे के नाम पर होने वाले शोषण को उजागर किया है। पर भरोसा तीन परोसा बताती है कि कैसे लोग मीठी बातों और झूठे आश्वासनों के सहारे दूसरों का उपयोग करते हैं। यह कहानी केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं रहती सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी भरोसे के दुरुपयोग की ओर संकेत करती है।
जय भगवान कहानी भाग्यवाद की मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है। यहां हर समस्या का समाधान भगवान पर छोड़ देने की प्रवृत्ति दिखाई गई है। लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि केवल “जय भगवान” कह देने से जीवन की समस्याएं हल नहीं होतीं कर्म और प्रयास आवश्यक हैं। यह कहानी धार्मिक आस्था का विरोध नहीं करती निष्क्रियता की आलोचना करती है।
संग्रह की अंतिम कहानी घोर अपराध नैतिकता और सामाजिक न्याय के प्रश्न उठाती है। यहां ‘अपराध’ केवल कानूनी नहीं नैतिक स्तर पर भी परिभाषित होता है। कहानी पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या समाज द्वारा सामान्य माने जाने वाले कुछ कर्म वास्तव में घोर अपराध नहीं हैं ? अनोखी बहू कहानी-संग्रह छत्तीसगढ़ी समाज का यथार्थवादी, संवेदनशील और आलोचनात्मक चित्र प्रस्तुत करता है।
कमलेश प्रसाद शर्मा बाबू की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे लोकभाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान करते हैं। उनकी कहानियां सरल हैं लेकिन अर्थ में गहरी।
यह संग्रह छत्तीसगढ़ी कथा-साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है। इसमें नारी विमर्श, श्रम-सम्मान, अंधविश्वास, गरीबी, शोषण और नैतिकता जैसे विषय अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरते हैं। अनोखी बहू केवल कहानियों का संग्रह नहीं छत्तीसगढ़ी समाज की आत्मकथा है।
समीक्षक
डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
मोबाइल - 9424210208




















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