जिला सिवनी मध्यप्रदेश
लखनादौन में 'संवैधानिक डकैती' का महा-खुलासा; आदिवासियों के हक पर 'हैप्पी सिंडिकेट' का कब्जा और सफेदपोशों का पाखंड
सी एन आई न्यूज सिवनी
लखनादौन/ लोकतंत्र की सबसे वीभत्स तस्वीर तब देखने को मिलती है जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में उतर आए। लखनादौन की पावन धरा, जो आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है, आज 'सफेदपोश शिकारियों' की चरागाह बन चुकी है।
कथित सूत्रों के अनुसार, यहाँ सत्ता और रसूख की आड़ में एक ऐसा 'हैप्पी सिंडिकेट' सक्रिय है, जिसने न केवल आदिवासियों के अधिकारों को निगला है, बल्कि सरकारी जमीनों को भी अपनी जागीर बना लिया है। नगर परिषद उपाध्यक्ष श्रीमती विजुशा राजपूत के पति प्रदीप राजपूत 'पिंटी' (अधिवक्ता) द्वारा हाल ही में कांग्रेस के झंडे तले किया गया आंदोलन, सूत्रों के दावे के अनुसार, जनहित का संघर्ष नहीं बल्कि अपने काले कारनामों पर 'राजनीतिक पर्दा' डालने का एक सुनियोजित स्वांग है।
आदिवासी अधिकारों का चीरहरण: 'सतीश उईके' मात्र एक डमी?
लखनादौन की जनता और प्रबुद्ध वर्ग आज व्यवस्था से एक ही सवाल पूछ रहा है—क्या आदिवासियों के लिए आरक्षित संसाधनों का लाभ वास्तव में उस समाज को मिल रहा है? नगर परिषद शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की दुकान क्रमांक सी-03, जो संवैधानिक रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए आरक्षित थी, आज भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा चेंबर बन चुकी है।
कथित आरोप और सूत्रों के दावे:
मुखौटा राजनीति: विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि सतीश उईके का नाम केवल प्रशासन की आँखों में धूल झोंकने के लिए 'डमी' के तौर पर इस्तेमाल किया गया। हकीकत में इस दुकान का आर्थिक लाभ और संचालन 'हैप्पी स्पोर्ट्स' के बैनर तले सिंडिकेट से जुड़े प्रभावशाली लोग कर रहे हैं।
PESA कानून की हत्या: यह कृत्य न केवल अनैतिक है, बल्कि अनुच्छेद 244 और पेसा (PESA) कानून की मूल भावना की सरेआम हत्या है। सूत्रों के अनुसार, एक आदिवासी के हक को छीनकर अपना 'व्यावसायिक साम्राज्य' खड़ा करना 'नैतिक दिवालियापन' की पराकाष्ठा है।
NHAI की बेशकीमती भूमि पर 'भू-माफिया' वाला अंदाज
भ्रष्टाचार की यह गाथा नगर परिषद की फाइलों से निकलकर नेशनल हाईवे तक जा पहुँची है। कथित सूत्रों के अनुसार, लखनादौन क्षेत्र में NHAI (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) की अधिग्रहित और संरक्षित भूमि पर भी इन 'प्रभावशाली चेहरों' ने अपने रसूख के बल पर अवैध कब्जे जमा रखे हैं।
विश्वस्त सूत्रों की रिपोर्ट:
'हैप्पी सिंडिकेट' ने राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे की जमीनों पर न केवल अतिक्रमण किया है, बल्कि वहां व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ाकर सरकारी तंत्र को खुली चुनौती दी है। सवाल यह है कि NHAI और स्थानीय राजस्व प्रशासन ने आज तक इस अतिक्रमण पर अपनी आँखें क्यों मूंदे रखी हैं? क्या उपाध्यक्ष पति का 'अधिवक्ता' वाला दबदबा कानून के हाथ बांधने के लिए पर्याप्त है? जब जनप्रतिनिधि ही 'भू-माफिया' की तर्ज पर काम करने लगें, तो लखनादौन का विकास केवल एक कागजी पुलिंदा बनकर रह जाता है।
मौन निकाह' से 'विदाई' तक: भ्रष्टाचार का राजनीतिक पाखंड
9 मार्च 2026 को एसडीएम कार्यालय के सामने हुआ प्रदर्शन 'राजनीतिक दोगलेपन' का उत्कृष्ट उदाहरण था। दिनेश ठाकुर (अध्यक्ष, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी) के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन में प्रदीप राजपूत की मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिंडिकेट की 'डाइवर्जन टैक्टिक' (ध्यान भटकाने की रणनीति):
कथित सूत्रों का कहना है कि जब नगर परिषद में 2.41 करोड़ का महा-घोटाला हुआ, तब सत्ता और विपक्ष के बीच जो "मौन समझौता" हुआ था, आज उसी की 'विदाई' का समय आ गया है। ईओडब्ल्यू (EOW) की जांच से बचने के लिए अब "प्रशासन होश में आओ" के नारे लगाना एक 'क्लासिक डाइवर्जन टैक्टिक' है। सूत्रों के अनुसार, यह आंदोलन केवल जांच की दिशा को उन 6 प्रभावशाली सूत्रधारों से भटकाने का एक 'प्रायोजित स्टंट' है, जो इस पूरे खेल के असली खिलाड़ी हैं।
विधिक पाखंड: शक्ति की आड़ में संवैधानिक डकैती
एक अधिवक्ता द्वारा कानून की आड़ में कानून की धज्जियाँ उड़ाना लखनादौन के लोकतांत्रिक ढांचे पर करारा प्रहार है। सूत्रों के अनुसार, नगर परिषद के खजाने में फूटी कौड़ी जमा किए बिना और कलेक्टर की अनुमति के बगैर दुकान सी-03 का कब्जा लेना म.प्र. भू-राजस्व संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है।
लोक सेवक का दुरुपयोग: पत्नी (उपाध्यक्ष) के पद की धौंस दिखाकर बिना रसीद और बिना NOC के कब्जा लेना 'ऑफिस का दुरुपयोग' है।
EOW की संदिग्ध चुप्पी: सूत्रों का दावा है कि 'हैप्पी स्पोर्ट्स' और दुकान सी-03 के बकाया ₹12.10 लाख की फाइलों को प्रशासनिक स्तर पर 'मैनेज' किया गया है। आखिर क्या कारण है कि ईओडब्ल्यू की रडार से यह सिंडिकेट अब तक बाहर है?
EOW का 'सुस्त' शिकंजा और सरकार की नियत पर सवाल
लखनादौन की गलियों में यह सवाल गूँज रहा है कि आखिर EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) का शिकंजा इन सफेदपोशों पर कब कसा जाएगा? जब घोटाले की कड़ियां साफ तौर पर उपाध्यक्ष निवास और उनसे जुड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों से जुड़ रही हैं, तो जांच की सुई वहां पहुँचते ही क्यों ठिठक जाती है?
ईओडब्ल्यू की यह 'चुनिंदा सक्रियता' जनता के मन में संदेह पैदा कर रही है। क्या जांच एजेंसी उन 'अदृश्य हाथों' के दबाव में है जो भोपाल से लेकर सिवनी तक इस सिंडिकेट को संरक्षण दे रहे हैं? यदि समय रहते मुख्य लाभार्थियों को जांच के घेरे में नहीं लिया गया, तो सरकार का 'जीरो टॉलरेंस' का नारा केवल एक चुनावी जुमला ही माना जाएगा।
सामाजिक पृष्ठभूमि और सरकार की 'नियत' का लिटमस टेस्ट
लखनादौन एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहाँ की राजनीति आदिवासियों के नाम पर शुरू होती है, लेकिन संसाधनों का बंदरबांट 'सफेदपोश शिकारियों' के बीच होता है।
प्रशासनिक लकवा: स्थानीय राजस्व अमला और नगर परिषद के अधिकारी इस अवैध कब्जे को देखकर भी 'धृतराष्ट्र' बने हुए हैं।
नियत का सवाल: सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह आदिवासियों के हितों की रक्षक है या इन सिंडिकेट्स की ढाल?
नारों की गूँज में छिपता 'अपराध'
लखनादौन की जनता अब नारों के झांसे में आने वाली नहीं है। प्रदीप राजपूत का आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के 'सिंडिकेट' को बचाने का एक अंतिम और हताश प्रयास है।
हमारी स्पष्ट और कठोर मांगें:
बुलडोजर कार्रवाई: NHAI तत्काल अपनी भूमि का सीमांकन कर 'हैप्पी सिंडिकेट' के अवैध कब्जों को जमींदोज करे।
आरक्षित दुकान की बहाली: दुकान क्रमांक सी-03 का आवंटन तत्काल रद्द कर उसे वास्तविक पात्र आदिवासी हितग्राही को सौंपा जाए।
उच्च स्तरीय जांच: ईओडब्ल्यू प्रदीप राजपूत और उनके सहयोगियों के 'अघोषित आय के स्रोतों' और दागी ठेकेदारों (सतकीरत हाईवे) के साथ उनके वित्तीय लेनदेन की न्यायिक जांच करे।
"आदिवासियों के हक पर डाका डालने वाले और NHAI की जमीन निगलने वाले जब 'भ्रष्टाचार' पर भाषण देते हैं, तो वह 'लोकतंत्र का चीरहरण' कहलाता है। लखनादौन को अब नारों की नहीं, इन 'सफेदपोश लुटेरों' से मुक्ति की आवश्यकता है।"
जिला ब्यूरो छब्बी लाल कमलेशिया की रिपोर्ट



















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