आबकारी विभाग की मनमानी और शराब माफिया का तांडव, क्या 'तेज-तर्रार' कलेक्टर ने साध ली है चुप्पी?
सतना। जिले में इन दिनों आबकारी विभाग की कार्यशैली और शराब ठेकेदारों की मनमानी चर्चा का विषय बनी हुई है। सोशल मीडिया से लेकर समाचार पत्रों की सुर्खियों तक, हर तरफ अवैध वसूली और ओवररेटिंग की गूंज है। बावजूद इसके, अपनी सख्त कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले कलेक्टर सतीश कुमार एस की खामोशी अब जनता के बीच कौतूहल और आक्रोश का विषय बनती जा रही है। जिले में शराब माफिया और ठेकेदारों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे आम जनता को खुलेआम लूटने में लगे हैं। प्रिंट और डिजिटल मीडिया में लगातार आ रही खबरों के बाद भी प्रशासन का सुस्त रवैया कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या आबकारी विभाग अब किसी भी नियम-कायदे से ऊपर हो गया है? या फिर जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर इस ओर से आंखें मूंदे बैठे हैं?
जनता के मन में उठते कुछ कड़वे सवाल
क्या सतना के शराब माफिया के मन में अब प्रशासन या कलेक्टर के खौफ का अंत हो चुका है? जब विभाग के ऊपर उच्च अधिकारियों का नियंत्रण होता है, तो फिर आबकारी विभाग की बेलगाम कार्यशैली पर लगाम क्यों नहीं कसी जा रही? जिले के विभिन्न क्षेत्रों में शराब की दुकानों पर निर्धारित रेट से कहीं अधिक वसूली की जा रही है। इसे 'खुली लूट' न कहा जाए तो क्या कहा जाए?
मौन के पीछे की पहेली
कलेक्टर सतीश कुमार एस को एक निर्णय लेने वाले और सख्त अधिकारी के रूप में जाना जाता है। लेकिन शराब सिंडिकेट के मामले में उनकी 'चुप्पी' समझ से परे है। जानकारों का मानना है कि यदि जल्द ही इस पर कड़ा प्रहार नहीं किया गया, तो सरकार की छवि को भारी नुकसान पहुँच सकता है। जब रक्षक ही मौन हो जाए, तो भक्षक का साहस बढ़ना स्वाभाविक है। सतना की जनता अब मुख्यमंत्री और शासन से उम्मीद लगाए बैठी है कि क्या इस 'कुंभकरणी नींद' को तोड़ने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?"
सतना में शराब माफिया का बढ़ता प्रभाव और आबकारी विभाग की संदिग्ध कार्यप्रणाली इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं तंत्र में गहरी खामी है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन अपनी साख बचाने के लिए कोई 'सर्जिकल स्ट्राइक' करता है या यह 'मौन' इसी तरह जारी रहता है।


















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