यह त्यौहार मां देवी गंगा ,(भोजली ) के नाम से पूरे छः ग में प्रसिद्ध है।
इस पर्व को पूरे छः ग में मनाया जाता है।
सावन महिने के पंचमी त्यौहार के बाद जब 7 दिन रक्षाबंधन की त्यौहार बचा रहेता है तब गेहूं के बीज को भिगाया जाता है और साते, आठे को कण्डा के खातुर में गेहूं के बीज को दबाकर थाली में, कटोरी में, गिलास में, चुरकी में,सराई के पत्ते की दरोना बनाकर बोया करते हैं।
सवेरा उठकर स्नान करके मां देवी गंगा (भोजली) दाई का पूजन-अर्चन करते हैं।
और शाम को भी पूजा-अर्चना करते हैं , महिलाएं, बच्चे जुटकर अपने अपने घरों में एक साथ मिलकर मां देवी गंगा ( भोजली ) दाई का गीत गाते हैं।
ठीक रक्षाबंधन के दूसरे ही इसे गांव के जितने दिन घरों में भोजली बोये रहते हैं, सभी लोग बैगा के घर में लाकर एकत्रित करते हैं। एकत्रित करने के बाद बैगा अपने घर में पूजा अर्चना करता है, उसके बाद गांव भर के लोग मिलकर भोजली दाई का गीत गाते गाते समस्त भक्त गण मिलकर पूरे श्रद्धा भक्तिके साथ इन बाजो के साथ मांदर, ढोलक,झांझ,मंजिरा,
झुमका बजाते हुए पूरे गांव के गलियों से चलकर जाते हैं। और किसी नदी या तालाब में लेजाकर शाम के समय पूजा-अर्चना करके जलदेव सागर में मां देवी गंगा (भोजली)को ठंडा करते हैं।
मां देवी गंगा भोजली दाई की जय
लक्ष्मी महंत के साथ नरेंद्र कुमार की रिपोर्ट



















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