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Wednesday, August 26, 2020

स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु घोषित ना होना दुर्भाग्यपूर्ण -- पुरी शंकराचार्य


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

जगन्नाथपुरी -- ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज समय समय पर संकेत करते हैं कि स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं के आदर्श व  अस्तित्व रक्षा के लिये सार्वभौम धर्मगुरु स्थापित ना होना देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। उनका कथन है कि --- क्या संकेत किया , आज गति क्या है ? अंग्रेजों के शासनकाल तक भारत को सार्वभौम धर्मगुरु की पहचान थी , आज भारत का कोई सार्वभौम धर्मगुरु नहीं है , आज सबकी अपनी अपनी ढपली , अपना अपना राग। आज क्रिश्चनों के पास सार्वभौम धर्मगुरु के रूप में , मजहब पंथ गुरु के रूप में पोपजी का नाम लिया जाता है। आज बौद्धों के लिये सार्वभौम गुरु के रूप में, पंथ गुरु के रूप में , मजहब गुरु के रूप में दलाई लामा जी का नाम लिया जाता है । भारतवासियों से पूछना चाहते हैं कि आपका सार्वभौम धर्मगुरु कौन है ?  जगद्गुरु की बात को अभी छोड़ दें। बहुनायकवाद जो है , एक के अंदर काम ना करने की भावना है। अपने अनुयायियों का उपयोग अपने तुच्छ व्यक्तित्व के पोषण के लिये करने की भावना है , यह हम सबके लिये पतन की बात है। इसीलिये जब अंग्रेजों के शासनकाल में भी हमारे कोई सार्वभौम धर्मगुरु थे , तो आज स्वतंत्र भारत में क्या विकृति आ गयी ? आज  कोई बता सकता है क्या कि हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु कौन है ?  आपको कहना पड़ेगा, भाजपा के स्वर में , कांग्रेस के स्वर में , बसपा के स्वर में , सपा के स्वर में कि दलाई लामा जी। हिन्दुओं के धर्मगुरु दलाई लामा हैं, दलाई लामा जी स्वयं कहते हैं कि मैं हिन्दू नहीं हूंँ। विश्वगुरु कौन हैं ? जिनके शरीर छूटने पर तीन दिनों तक भारत का राष्ट्रीय ध्वज झुका रहा , पोप महोदय। भारत की धरती से सनातन वैदिक धर्म से अपनत्व रखने वाले भारत में सार्वभौम धर्मगुरु का विलोप है , इस बात पर ध्यान देना चाहिये। कहीं हमारा बहुनेतृत्ववाद हमारे पतन में हेतु ना हो जाये , इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिये।

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