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Sunday, January 31, 2021

हमारा सर्वेश्वर शास्त्रैकसमधिगम्य और स्वत:सिद्ध --- पुरी शंकराचार्य



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जगन्नाथपुरी- ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज हम सनातनियों के ईश्वर की महत्ता प्रतिपादित करते हुये संकेत करते हैं कि वह जगत बनता है और जगत बनाता भी है इसलिये शास्त्रैकसमधिगम्य और स्वत:सिद्ध है। पुरी शंकराचार्य जी कहते हैं कि  प्रत्यक्षादि इतर  प्रमाणों से अनधिगत और अबाधित वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्द-स्वरूप सर्वेश्वर का नाम ब्रह्म है। वेदान्तप्रस्थान के अनुसार सृष्टि उसकी अभिव्यक्ति और उसका अभिव्यञ्जक संस्थान है ; तथापि स्वतन्त्ररूप से वरण करने योग्य नहीं है। प्रामाणिक रीति से विचार करने पर श्रीराम-कृष्ण-दुर्गादि विविधरुपों में अवतीर्ण सृष्टि के अभिन्ननिमित्तोपादानकारण सच्चिदानन्द -- स्वरूप सर्वेश्वर ही वरणीय है। सर्वेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और सर्वनियामकता तथा सर्वरूपता तब तक सम्भव नहीं है, जब तक उसे जगत् का निर्माता ही नहीं ; अपितु उपादानकारण अर्थात् जगत बनने वाला भी स्वीकार ना किया जाये। सनातनियों का सर्वेश्वर विधुरपरिभावित कान्तासाक्षात्कारवत् भावुकों की प्रमाणविधुर कोरी भावुकता सिद्ध नहीं है। वह अखण्ड धूमलेखा के दर्शन से पर्वत में अनुमित अर्थक्रियाकारितारहित वह्निसदृशु तार्किकों की कोरी तर्कणाशक्तिप्रसूत भी नहीं है, अपितु शास्त्रैकसमधिगम्य और स्वत:सिद्ध है। जिस प्रकार योगव्याघ्र को बनाने वाला और योगव्याघ्र बनानेवाला स्वयं योगी ही होता है, उसी प्रकार वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्दस्वरुप सर्वेश्वर सृज्य तथा सर्जनक्रिया का सम्पादक सर्जक दोनों ही है। उस सर्वेश्वर का उत्कर्ष दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक धरातल पर अनुपम है। अत: उसके भक्तों का उत्कर्ष भी अद्भुत है। वह सर्वेश्वर सर्व, सर्वगत, सर्वान्तरात्मा, सर्वातीत, सर्वरहित तथा सगुण-निर्गुण - साकार-निराकार उभयरुप है। सनातन सर्वेश्वर वही है, जो सर्व जीवों की चाह का वास्तव विषय सच्चिदानन्दस्वरुप है। वह आत्मीय ही नहीं ; अपितु साक्षात् आत्मस्वरूप ही है। वह उसके अंश - सदृश सर्व जीवों का आस्थास्पद और आकर्षणकेन्द्र अवश्य है। उसके वरण से मृत्यु, अज्ञता, दु:ख का आत्यन्तिक उच्छेद सुनिश्चित है। उसके साक्षात्कार की भावना से और विश्व को विप्लवपूर्ण विभीषिका से बचाने की वाञ्छा से अर्थ और काम को पुरूषार्थविहीन होने से बचना अत्यावश्यक है। ध्यान रहे ; चोरी, हिंसा झूठ, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, मद, भेद, वैर, अविश्वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, द्यूत और मद्य रुप पन्द्रह अनर्थों के चपेट से अर्थ को विमुक्त रखने पर अर्थ पुरूषार्थ मान्य है ; अन्यथा अर्थ अनर्थ ही सिद्ध है । तद्वत् काम को देशातिक्रम, कालातिक्रम, पात्रातिक्रम, अशुचि, देशकालानुसार सावरणता तथा आंशिक या पूर्ण निरावरणता की अनभिज्ञतारूपा अरसता, असंयम, निन्दा, वाचालता, अश्लीलता, मदविह्ललता, अभक्ष्यभक्षण, अतिसामीप्य, अतिदूरता, अस्निग्धता और अनुदारतारूप पन्द्रह दोषों से विमुक्त रखना परमावश्यक है।

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