अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जगन्नाथपुरी - हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु पुरी पीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग ने श्रीगोवर्धन मठ में हिन्दु राष्ट्र संघ अधिवेशन के पंचम चरण के दो दिवसीय उद्बोधन में संकेत किया कि इस राकेट ,कम्यूटर ,एटम और मोबाइल के युग में भी सनातन वेदादिशास्त्रसम्मत सिद्धान्त सर्वोत्कृष्ट ही नहीं एकमात्र उत्कृष्ट है। दार्शनिक , वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक धरातल पर लौकिक एवं पारलौकिक उत्कर्ष तथा परमात्मा तक पहुंँचाने वाला एकमात्र साधन सनातन सिद्धान्त ही है , जो कि हर काल , हर परिस्थिति एवं हर व्यक्ति के लिये उपयोगी सिद्ध है। भगवान की शक्ति प्रकृति के परिकर आकाश , वायु , तेज , जल एवं पृथ्वी के रूप में व्यक्त है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के फलस्वरूप स्थावर, जङ्गम आदि प्राणी के रूप को प्राप्त करता है। प्रकृति के परिकर पृथ्वी , जल , तेज , वायु और आकाश को जो मान्य या सह्य है , वही विकास है। चतुर्दश भुवनात्मक ब्रह्मांड में जहांँ कहीं भी दिव्यता परिलक्षित है उसके मूल में वेदादि शास्त्रसम्मत कर्मकाण्ड , उपासनाकाण्ड के कारण है। प्राणियों के चाह का विषय मृत्यु से अतिक्रांत जीवन की प्राप्ति होती है। प्रत्येक अंश स्वभावत: अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है। पार्थिव पदार्थ अपने अंशी पृथ्वी , जल के स्त्रोत समुद्र तथा अग्नि तत्त्व उर्ध्व दिशा में अपने अंशी सूर्य की ओर आकृष्ट होता है। ठीक इसी प्रकार प्रत्येक जीव के चाह का विषय सच्चिदानन्द स्वरूप सर्वेश्वर की प्राप्ति है। वह मृत्यु के भय को त्यागकर अमरत्व की चाह की भावना निसर्गसिद्ध है। गाढ़ी नींद की अवस्था में प्रिय, मोद , प्रमोद जैसे विषयजन्य आनन्द की चाह नहीं होती ; दैहिक , दैविक , भौतिक त्रिविध ताप से मुक्ति ; मृत्यु का भय नहीं होता ; काम ,क्रोध , लोभ , मोह , शोक जैसे मनोविकार की पहुंच नहीं ; सर्दी , गर्मी जैसे द्वंद की प्राप्ति नहीं होती ,यह एक प्रकार से समाधि की अवस्था होती है। लेकिन नींद की अवस्था में भी मृत्यु का भय बीज रूप में सुरक्षित रहता है जिसके निवृत्ति से ही परमात्व तत्त्व की प्राप्ति संभव है। बीज में सन्निहित फल , फूल, कांटे आदि का सामान्य दृष्टि में दर्शन संभव नहीं , परन्तु उसी बीज में अनुकूल पृथ्वी , पानी , प्रकाश , वायु के संसर्ग से फल , फूल आदि प्रकट हो जाते हैं। बीज में सन्निहित भविष्य के रूप का अप्रत्यक्ष दर्शन ही सनातन सिद्धांत की विशेषता है। विषम एवं सदोष का नाम सृष्टि है , वहीं सम और निर्दोष का नाम परमात्मा है। यज्ञादि से वर्षा , वर्षा से अन्न तथा प्राप्त अन्न से प्रजा का पोषण होता है। 80 प्रतिशत कर्मकाण्ड , 16 प्रतिशत उपासना तथा 04 प्रतिशत ज्ञान के वेदादिशास्त्र विधा से परमात्मा की प्राप्ति संभव है। इस प्रकार वेदोक्त कर्म का पर्यावसान परमात्मा में हो सकता है। सनातन शास्त्रसम्मत भोजन , वस्त्र , आवास , शिक्षा ,चिकित्सा, उत्सव - त्यौहार , यातायात आदि पद्धति आज भी सर्वश्रेष्ठ है। भोजन के रूप में पंचतत्वों के तेजयुक्त पुष्टता ; वस्त्र से शील , स्वास्थ्य की रक्षा ; आवास से वटवृक्ष की भांति सर्दी में गर्मी तथा गर्मी में ठंडकता का एहसास ; नीति और अध्यात्म सन्निहित शिक्षा से दिव्यता का संचार ; उत्सव- त्योहार से आराधना के साथ साथ सभी वर्ग को रोजगार की सुलभता उपलब्ध होती है । इसी प्रकार चिकित्सा पद्धति में रोग के प्रभाव के स्थान पर मूल रोग के कारण का निवारण प्रमुख था। ये सब सनातन सिद्धांत में निहित ज्ञान विज्ञान है। पुरी शंकराचार्य जी मन्त्र , तन्त्र और यन्त्र के वेदसम्मत अर्थ को स्पष्ट करते हुये संकेत करते हैं कि किसी तत्त्व में निहित निसर्गसिद्ध नियम का दर्शन करना मन्त्र है। मन्त्र को यन्त्र के रूप में पहुंँचाने की प्रक्रिया का नाम तन्त्र होता है। वैज्ञानिक किसी नियम के सिर्फ दृष्टा हो सकते हैं , कर्त्ता नहीं। भौतिकवादी पेट भरने के लिये अन्न को भोजन के ही रूप में ग्रहण करते हैं। परन्तु सनातन सिद्धांत के अनुसार अन्न भगवान द्वारा प्रदत्त वस्तु है , जिसमें भूख मिटाने के साथ साथ , पृथ्वी , जल ,तेज , वायु की शक्ति भी सन्निहित है , अतः हमारे लिये भोग बन जाता है , जिसको परमात्मा को अर्पण कर प्रसाद रूप में हम ग्रहण करते हैं।


















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