अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज निष्पाप परमात्मा के विविध स्वरूप के संबंध में संकेत करते हैं कि पूर्ण निष्पाप केवल परमात्मा हैं। कहीं जल से पृथ्वी आवृत रहती है , कहीं पृथ्वी से जल आवृत रहता है ; तद्वत् अनादि , अविद्या , काम तथा कर्म के वशीभूत जीवों के जीवन में कभी पुण्य से पाप आवृत रहता है , कभी पाप से पुण्य आवृत रहता है । सुसङ्ग पाप का तथा कुसङ्ग पुण्य का समाच्छादक बनता है। सत्सङ्ग के अमोघ प्रभाव से जब जीव आत्मा की अद्वितीय सच्चिदानन्दरूपता का विमलबोध प्राप्त करता है ; तब देहपात के अनन्तर पुण्य तथा पाप से अतीत परमात्मरूप होकर शेष रहता है। अज अनादि , निर्गुण , निष्क्रिय निरपेक्ष , निरूपाधिक अद्वय ज्ञान का नाम तत्त्व है। वही जन्मशील क्रियाशील जड़वर्ग का अधिष्ठानात्मक परमोपादान भी है ।उसी में वेदों का चरम तात्पर्य भी सन्निहित है। वह अव्यक्ताक्षर अर्थात् सनातन अव्यक्त है , वही हिततत्त्व है।वह सम , असङ्ग , सुखरूप तथा विभु है। उसकी विशुद्ध सत्त्व के योग से व्यक्त सम , असङ्ग , सुखरूप विभुस्वरूप अभिव्यञ्जक उपाधि की विवक्षा से गुण- संज्ञा है तथा अभिव्यङ्ग्यस्वरूप की विवक्षा अगुण संज्ञा है। अभिव्यक्त समत्व , असङ्गादि गुणगण शेष और अभिव्यङ्ग्य सम , असङ्गादि स्वरूप शेषी है। उक्त विधा से जिस प्रकार साकार का मूल सगुण है ; उसी प्रकार सगुण का मौलिकस्वरूप निर्गुण है। अतएव निर्गुण का निराकार होना भी स्वत: सिद्ध है , उसी के विज्ञान से कैवल्यसिद्धि सम्भव है।श्रीमद्भगवद्गीता के अट्ठारहवें अध्याय में शरीर , वाणी और मन के द्वारा अनुष्ठित वैध या अवैध कर्म के अधिष्ठान , कर्त्ता , विविध करण , विविध चेष्टा और दैव नामक पांँच हेतुओं का भगवान श्रीकृष्ण किया है, इसी सन्दर्भ में उन्होंने ज्ञान , श्रेय , ज्ञाता को कर्मचोदना तथा करण , कर्म और कर्त्ता को कर्मसंग्रह कहा है। उक्त प्रकार से कर्मसिद्धि के सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने अधिष्ठान , कर्त्ता , विविध करण , विविध चेष्टा , दैव ; शरीर , वाणी , मन ; ज्ञान , ज्ञेय , ज्ञाता तथा करण , कर्म और कर्त्ता- संज्ञक चौदह तत्त्वों का निरूपण किया है , इनमें शरीर आयतनरूप अधिष्ठान है । वाणी तथा मन की करणरूपता है । तदनन्तर श्रीहरि ने ज्ञान , कर्म , कर्त्ता , बुद्धि , धृति , सुख , ब्रह्मकर्म , क्षात्रकर्म , वैश्यकर्म , शूद्रकर्म तथा ईश्वर का प्रतिपादन किया है। इनमें ज्ञेय तथा ज्ञाता का वर्णन परिलक्षित नहीं होता। श्रीहरि ने कर्त्ता को अतिशय प्रिय वैयाकरणाभिमत कर्म का ज्ञेयसंज्ञक सुखरूप से और कर्म के योग से ज्ञाता की कर्तृसंज्ञा होने के कारण ज्ञाता का कर्त्तारूप से निरूपण किया है । त्रिभुवन में प्रकृतिप्रसूत सर्व क्रिया , कारक और फल की सत्त्व , रजस् तथा तमस् संज्ञक त्रिगुणता सिद्ध है ; अतः ज्ञान, कर्म, कर्त्ता, बुद्धि धृति, सुखादि की त्रिविधता का वर्णन किया गया है ।


















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