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Saturday, January 23, 2021

भगवन्नाम ही मोक्ष का साधन है--हरिकृष्ण महाराज

 


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


बलौदाबाजार - भगवान की शरण में रहने वाले विरले भक्तों के पाप श्री भगवान के नामोच्चारण से ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य उदय होने पर कोहरा नष्ट हो जाता है। जिन्होंने अपने भगवद गुण अनुरागी मन मधुकर को भगवान श्री कृष्ण के चरणारविन्द में मकरन्द का एक बार पान करा दिया; उन्होंने सारे प्रायश्चित कर लिये। वे स्वप्न में भी यमराज और उनके पाशधारी दूतों को नहीं देखते। ईश्वर का मार्ग ही मोक्ष का मार्ग है। भगवान का नाम लेने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। हमें अंततः ईश्वर के ही पास जाना है इसलिेये हमें तय करना होगा कि यमदूत हमें रस्सियों में बांधकर घसीटते हुये ले जायें या हमें सम्मान के साथ प्रभु शरण प्राप्त हो। 

उक्त बातें बलौदाबाजार में स्व० चतुरसिंह वर्मा के स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन पं० श्री हरिकृष्ण महाराज जी ने अपने मुखारविंद से अजामिल मोक्ष कथा का श्रवण पान कराते हुते कही। इस कथा के उपाचार्य पं० श्री शुभम कृष्ण जी महाराज और मुख्य यजमान दिनेश्वरी हीरेन्द्र कुमार वर्मा हैं। इस कथा के सहप्रायोजक मासिक पत्रिका अस्मिता और स्वाभिमान परिवार है। दुष्ट एवं दुराचारी होने के बाबजूद संतों की एक दिन की संगत से अजामिल को मोक्ष मिलने की कथा को विस्तार से बताते हुते महाराज श्री ने कहा अजामिल एक धर्मपरायण , गुणी समझदार और विष्णुभक्त था। माता-पिता के आज्ञाकारी पुत्र ने किशोरावास्था तक वेद-शास्त्रों का विधिवत अध्ययन कर लिया। युवावस्था में प्रवेश करते ही एक दिन उसके साथ ऐसी घटना घटी कि उसका पूरा जीवन परिवर्तित हो गया। पिता के आदेश पर आजामिल एक दिन पूजा के लिये वन से उत्तम फल और फूल लेकर लौट रहा था. रास्ते में उसे एक बाग में भील के साथ सुंदर युवती दिखी। उसके रूपजाल में फंसा अजामिल अपने संस्कार तक भूल गया और उसने युवती से गंधर्व विवाह कर लिया। स्त्री की जरूरतें पूरी करने के लिये अजामिल चोरी, डकैती, लूटपाट करता. मदिरापान और जुये की लत पड़ गई थी। उसे बुरे कर्मों में ही संतुष्टि मिलने लगी. उस स्त्री से अजामिल को नौ पुत्र संताने हुईं और दसवीं बार उसकी पत्नी गर्भवती हुई। संयोगवश एक दिन कुछ सन्तों का समूह उसी जगह ठहरे और उन्होंने वहां से जाते समय अजामिल से अपनी संतान का नाम नारायण रखने को कहा। अजामिल को दसवीं संतान के रूप में एक पुत्र हुआ। संतों के कहने पर अजामिल की स्त्री ने उसका नाम ‘नारायण’ रख दिया। अजामिल स्त्री और अपने पुत्र के मोह जाल में जकड़ा रहा , हर समय उनको पुकारते रहता था। जब उनका मृत्यु समीप आया , भयानक यमदूत उसे लेने आये तो भी वह भय से व्याकुल नारायण! नारायण! पुकारने लगा। भगवान का नाम सुनते ही विष्णु के पार्षद तत्काल वहां पहुंचे , यमदूतों ने जिस रस्सी से अजामिल को बांधा था, पार्षदों ने उसे तोड़ डाला। यमदूतों के पूछने पर पार्षदों ने कहा कि नारायण नाम के प्रभाव से यह श्रीहरि का शरणागत है ,यमदूतों ने कहा कि यदि हमने अपना कार्य पूरा न किया तो धर्मराज का कोप झेलना पड़ेगा। इस व्यक्ति ने जीवनभर बुरे कर्म किये हैं , इसे घोर नर्क में स्थान मिला है। पार्षदों ने कहा- किंतु जब तुम इसे पकड़ने आये तो यह नारायण नाम का स्मरण कर रहा था. प्रभु के आदेश पर हम प्रभुनाम जपने वालों की सहायता करते हैं। इन्होंने अंत में नारायण का नाम लिया है इसलिेये इसे नरक नही ले जा सकते। इस तरह यमदूतों को भगवान के दूतों के सामने अजामिल को छोड़कर जाना पड़ा और अजामिल को मोक्ष की प्राप्ति हुई।

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