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Friday, April 9, 2021

राकेश्वर सिंह की रिहाई में पद्मश्री धर्मपाल सैनी की अहम भूमिका

 



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


रायपुर -- छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके के जिन जंगलों में शासन - प्रशासन के लोग जाने से कतराते हैं और आये दिन सुरक्षा बलों और नक्सलियों की मुठभेड़ होती रहती है , ऐसे खूनी क्षेत्रों में धर्मपाल सैनी एक सेतु की तरह हैं।लोकहित कार्यों के कारण उन्हें बस्तर की गांधी के नाम से जाना जाता है , साथ ही स्थानीय लोग प्यार से उन्हें ताऊजी भी कहते हैं। ये अक्सर सरकार और नक्सलियों के बीच संवाद की राह बनाते हैं। उनके प्रयासों से ही अभी मुठभेड़ के दौरान अगवा किये गये सी आरपीएफ के कमांडो राकेश्वर सिंह मनहास की रिहाई हो सकी है। जवान के नक्सली कब्जे में होने के बाद उसकी रिहाई के लिये मशक्कत चल रही थी।कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इसके लिये पहल की लेकिन उन्हें निराश लौटना पड़ा। इसी बीच धर्मपाल सैनी ने मध्यस्थता की और जवान सुरक्षित लौट सका। जानकारी के मुताबिक सैनी बीते कई महीनों से सरकार और नक्सलियों के बीच शांति वार्ता के लिए प्रयास कर रहे थे। वे धीरे-धीरे इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे , लेकिन बीच में केंद्रीय बलों ने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि बातचीत की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही पटरी से उतर गई। राकेश्वर सिंह के नक्सलियों के कब्जे में होने की पुष्टि होने के बाद जब मुख्यमंत्री बघेल ने उनसे अनुरोध किया तो सैनी एक्टिव हुए और उनकी रिहाई में अहम भूमिका निभाई।

राकेश्वर सिंह की रिहाई के बाद से ही 91 साल के धर्मपाल सैनी की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। लगभग छह दशकों से बस्तर के लिये समर्पित धर्मपाल सैनी का आदिवासियों और नक्सलियों के बीच भी सम्मान है। 

विनोबा भावे के शिष्य रहे धर्मपाल सैनी का बस्तर से नाता 1960 के दशक में जुड़ा था। धर्मपाल सैनी मूलत: मध्यप्रदेश के धार जिला के निवासी हैं। उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से कामर्स में ग्रेजुएशन किया था और वे शानदार एथलीट हुआ करते थे।उनकी बस्तर के गांधी बनने की शुरुआत साठ के दशक से शुरू होती है , उस दौरान उन्होंने बस्तर से जुड़ी एक खबर पढ़ी। उस खबर के अनुसार दशहरा के मेले से लौटने के दौरान लड़कियों ने छेड़छाड़ करने वालों का जमकर मुकाबला किया था। लड़कियों ने हाथ पैर काटकर उन लड़कों की हत्या कर दी थी। सैनी इस खबर से इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने उसी समय बस्तर आकर यहां की लड़कियों के लिये कुछ करने का फैसला कर लिया था। सैनी के मन में लगातार आ रहा था कि बस्तर के युवा बेहद बहादुर हैं और उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने की जरूरत है। इसी बात को सोचते हुये उन्होंने अपने गुरू विनोबा भावे से बस्तर जाने की इजाजत मांगी। कई बार आग्रह करने के बाद विनोबा भावे जी ने उन्हें पांच रुपये का एक नोट देकर बस्तर के लिये इस शर्त पर विदा किया कि वे कम से कम दस साल वहां रहेंगे। वर्ष 1976 में बस्तर आकर सैनी ने यहां कि बेटियों की जिंदगी को बदलने का बीड़ा उठाया और आज भी अनवरत चल रहे हैं , अब वे यहीं के होकर रह गये। उनके विद्यार्थी और स्थानीय लोग उन्हें ताऊजी कहकर बुलाते हैं। एथलीट रहे धर्मपाल सैनी ने अब तक बस्तर में दो हजार से ज्यादा खिलाड़ी तैयार किये हैं। वे बताते हैं कि जब वे बस्तर आये तो देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से चल लेते हैं। बच्चों के इस खूबियों को स्पोर्ट्स और एजुकेशन में यूज करने का प्लान उन्होंने तैयार किया। वे बच्चों को खेलने के लिये भी प्रशिक्षण देने लगे। वर्ष 1985 में पहली बार आश्रम की छात्राओं को उन्होंने स्पोर्ट्स कॉम्पिटीशन में उतारा। सैनी के डिमरापाल स्थित आश्रम में आज हजारों की संख्या में मेडल्स और ट्रॉफियां रखी हुई हैं। आश्रम की छात्रायें अलग-अलग खेलों में ईनाम के रूप में 30 लाख रुपये से ज्यादा की राशि जीत चुकी हैं। आदिवासी इलाकों में साक्षरता को बढ़ाने में धर्मपाल सैनी का अहम योगदान माना जाता है। सैनी के आने से पहले तक बस्तर में साक्षरता का ग्राफ 10 प्रतिशत भी नहीं था और जनवरी 2018 में ये बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया। जबकि आसपास के आदिवासी इलाकों का साक्षरता ग्राफ अब भी काफी पीछे है। बस्तर में शिक्षा की अलख जगाने के पीछे भी धर्मपाल सैनी की प्रेरणा काम करती है। उन के बस्तर आने से पहले तक आदिवासी लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं, वहीं आज बहुत सी पूर्व छात्रायें अहम प्रशासनिक पदों पर काम कर रही हैं। बस्तर में बालिका शिक्षा में अलख जगाने की योगदान के लिये धर्मपाल सैनी को साल 1992 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था। पद्मश्री के अलावा कई सम्मान उनके खाते में लगातार आते रहे। वर्ष 2012 में द वीक मैगजीन ने सैनी को मैन ऑफ द इयर चुना था। अब कोबरा कमांडो की इतने विपरीत हालातों में सुरक्षित रिहाई करवा पाना भी बताता है कि धर्मपाल सैनी की पैठ और मान्यता केवल बस्तर के घरों में नहीं , बल्कि नक्सली भी उन्हें सम्मान देते हैं।

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