अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज सनातन संस्कृति के अनुरुप जीवन प्रणाली की महत्ता , मानव जीवन का महत्व और वर्णाश्रम व्यवस्था के पालन से सबकी जीविका आरक्षित होने की सुनिश्चितता के संबंध में चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि मानव जीवन का दार्शनिक , वैज्ञानिक और व्यवहारिक धरातल पर अद्भुत महत्व है। इसमें कर्मेन्द्रिय , ज्ञानेन्द्रिय तथा प्राणों के सहित अन्त:करण का सम्यक् विकास है। इसमें कर्मायतन , भोगायतन तथा ज्ञानायतन होने के कारण देवदुर्लभ मान्य है।
इसमें धर्मसम्पादन , वैराग्य , भक्ति और भगवत्प्रबोध की शक्ति सन्निहित है। अतएव स्त्री तथा सेवकादि की भी देवदुर्लभता निसर्गसिद्ध है। ऐसी स्थिति में उन्हें मानवोचित स्नेह , सहानुभूति , सेवा , शिक्षा , संस्कार तथा सम्पन्नता से सम्पन्न करना आवश्यक है। सनातन संस्कृति के सर्वथा अनुरूप जीवन प्रणाली में कुटीर तथा लघु उद्योग के सम्पादक सेवकादि को वैश्य उचित लाभ देकर उपलब्ध सामग्रियों का उचित मूल्य पर विक्रय करते थे। वैश्य कृषि तथा गोपालन के द्वारा भी जीवीकोपार्जन करते थे। ब्राह्मण अध्यापन, दान, यज्ञादि विविध अनुष्ठान और खेत -- खलिहान तथा अनाजमण्डी में अवशिष्ट अन्न के संचय संज्ञक शिलोञ्छवृत्ति से , अयाचितवृत्ति से , सुलभ धन तथा सामग्री से यज्ञ -- दान -- अतिथिसेवा -- देवपितरपोषण -- तर्पणादि दैनिन्दनकृत्य का निर्वाह करते थे।
ब्रह्मचारी और सन्यासी भिक्षावृत्ति से तथा वानप्रस्थ कन्द -- मूल तथा फल के चयन से जीवन निर्वाह करते थे। उक्त रीति से सनातन संस्कृति में सबकी जीविका जन्म से आरक्षित थी। द्यूत , मद्य , हिंसादि अनर्थपर्यवसायी अर्थ ; मूर्च्छा और मृत्युपर्यवसायी काम ; वर्णसंकरता तथा कर्मसंकरता मूलक धर्म और देहात्मभावित मोक्ष की गाथा ने ; तद्वत् वर्ण , वेष , विधि -- निरपेक्ष कर्मकाण्ड, विवेक तथा वैराग्यनिरपेक्ष उपासनाकाण्ड, अहिंसा -- सत्य -- अस्तेय -- ब्रह्मचर्य -- अपरिग्रह संज्ञक यम तथा शौच -- सन्तोष -- तप: -- स्वाध्याय -- ईश्वरप्रणिधान संज्ञक नियम -- निरपेक्ष योग, विवेकवैराग्यादि
निरपेक्ष वेदान्त ; तद्वत् शर्मविहीन शासनतन्त्र ने पुरुषार्थविहीन मानव समाज को प्रेय और श्रेय दोनों से वंचित बना दिया है। जिन अर्थ और काम पर लट्टू होकर विश्व स्तर पर सामाजिक धरातल पर मनुष्यों ने प्रबल बहुमत से धर्म और मोक्ष का परित्याग किया है , उन्हें मोक्षपर्यवसायी धर्म के बिना पुरुषार्थ बना पाने की क्षमता ना होने के कारण पुरुषार्थविहीन मानव समाज ने स्वयं के और पृथिव्यादि पंचभूतों के सहित अन्य प्राणियों के विकृत तथा विलुप्त होने का बानक बनाकर सबके हित पर पानी फेरने का काम किया है ।


















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