पूर्वजो के प्रति आभार का पर्व है पितृ पक्ष
मुकेश श्रीवास्तव प्राचार्य सरस्वती शिशु रतनपुर के कलम से
रतनपुर से ताहिर अली
भारतीय संस्कृति मे तीज त्यौहारों एवं पर्वो को मनाने की परंपरा प्राचीन काल से ही रही है। साथ ही इन सबके पीछे का मूल भाव भी *वसुधैव कुटुम्बकम* ही रहा है।हर पर्वो को मनाने के पीछे उसकी विशेषता तो है ही साथ ही साथ बच्चों को इन के माध्यम भारतीय संस्कृति से जोड़े रखना भी एक कारण है।वर्ष भर के सभी त्यौहार एक दूसरे से जुड़कर एक श्रृंखला तैयार करते है।आज से प्रारंभ होने वाला पितृ पक्ष हमारी सनातन संस्कृति के माला की एक सुंदर मोती है।जहां हम हिंदू अपने पितरो को हमे एक नया सुंदर संसार देने के लिए आभार स्वरूप देवरूप मे पूजते है।हमारी संस्कृति की यही खूबसूरती विश्व को हमारी ओर खींचती है। माना गया है की भगवान हमारे पूर्वजो के लिए ये पंद्रह दिन आरक्षित किये हूए है और उन्हे भूलोक भ्रमण करने की अनुमति देते है कि वे जाकर देखे की उनके बच्चे किस तरह से उनके विरासत को सहेज रख पा रहे है।या उनके द्वारा स्थापित परंपरा को क्षति पहुचां रहे है।जिस तिथि को हमारे पूर्वजों या परिवार के सदस्य का अवसान हुआ,उस तिथि को पितृ श्राद्ध के रूप मे मनाते है उस दिन घर द्वार की विशेष साफ सफाई करके मुख्य द्वार पर गेहूँ आटे से कतारबद्ध चौक पूरते है और उनको ऋतुफूलो से सजाते है अर्थात अपने पूर्वजों के स्वागत के लिए वंदनद्वार सजाते है।परिवार के मुखिया ब्रह्ममूहूर्त मे पवित्र सरोवर मे स्नान करके तील जवा अक्षत से कुशा पहनकर तर्पण करते है।और घर की मातृशक्ति पितरो के भोजन के लिए बड़ा पूड़ी खीर गुड़ का पूआ आदि बनाती है।पितरो के पूजा के बाद अग्निदेव के माध्यम से पितरो को भोजन अर्पित किया जाता है।ब्राह्मण भोज का आयोजन होता है पितरो के नाम से दान पुन्य किया जाता है।ऐसा करने से पितृगण संतुष्ट होते है और अपने बच्चों को आशीर्वाद देते है।।जिन घरो मे पूर्वजों द्वारा स्थापित मूल्यो एवं परंपराओं का पालन होता है उनके वंशज धर्म का पालन करते हुए अपने कार्यक्षेत्र मे निरंतर सफलताएं अर्जित कर रहे हो,समाज मे अपने पूर्वजो का नाम आगे बढ़ा रहे हो दिनदुखियो की प्रति दया का भाव रखते हो।एवं समाजिक व्यवस्था के अनुरूप जीवन यावन कर रहे हो ये सब देखकर पितरो की आत्मा को शांति एवं संतुष्टि मिलती है एवं जो लोग समाज के विपरीत व्यवहार मे लिप्त रहते है।मद्यपान, भष्ट्राचार एवं अनैतिक कार्य करके जीवकोपार्जन करते है उनके पितर यह सब देखकर के दुखी होते हैऔर यही दुख पितृदोष का कारण बनता है।इस तरह पितरो के प्रति हमारी श्रद्धा का यह पर्व हमे यह संदेश देती है कि जिन्होंने हमे समाज के योग्य बनाया वे रहे या न रहे उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव बना रहे।साथ ही साथ यह पर्व हमे यह भी सिखाता है की भारतीय समाज मे महिलाओं का स्थान सदा से श्रेष्ठ ही रहा है। इसलिए पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृनवमी के रुप मे समर्पित किया गया है। पूरे पितृ पक्ष मे पितरो के लिए तर्पण, करना उनके प्रति आभार का ही भाव है और अंत मे पितृ मोक्ष अमावस्या को पितरो को इस कामना के साथ विदा किया जाता है कि उनकी कृपा दृष्टि , आशीर्वाद उनकी दुआ परिवार पर सदा बनी रहे।और जाने अनजाने मे यदि कुछ भूल हुई हो गई हो उसे क्षमा करते हुए अपने परम धाम को प्रस्थान करे।


















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