यज्ञ करने से संपूर्ण पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं - आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज
दमोह:ग्राम बरखेरा बैस मे चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिवस कथा वाचक आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने कहा कि एक दिन श्रीरामचन्द्रजी ने भरत और लक्ष्मण को अपने पास बुलाकर कहा हे भाइयों मेरी इच्छा राजसूय यज्ञ करने की है क्योंकि वह राजधर्म की चरमसीमा है इस यज्ञ से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा अक्षय और अविनाशी फल की प्राप्ति होती है अतः तुम दोनों विचारकर कहो कि इस लोक और परलोक के कल्याण के लिये क्या यह यज्ञ उत्तम रहेगा बड़े भाई के ये वचन सुनकर धर्मात्मा भरत बोले महाराज इस पृथ्वी पर सर्वाेत्तम धर्म यश और स्वयं यह पृथ्वी आप ही में प्रतिष्ठित है आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वी और इस पर रहने वाले समस्त राजा भी आपको पितृतुल्य मानते हैं अतः आप ऐसा यज्ञ किस प्रकार कर सकते हैं जिससे इस पृथ्वी के सब राजवंशों और वीरों का हमारे द्वारा संहार होने की आशंका हो भरत के युक्तियुक्त वचन सुनकर श्रीराम बहुत प्रसन्न हुये और बोले भरत तुम्हारा सत्यपरामर्श धर्मसंगत और पृथ्वी की रक्षा करने वाला है तुम्हारा यह उत्तम कथन स्वीकार कर मैं राजसूय यज्ञ करने की इच्छा त्याग देता हूँ तत्पश्चात लक्ष्मण बोले हे रघुनन्दन सब पापों को नष्ट करने वाला तो अश्वमेघ यज्ञ भी है यदि आप यज्ञ करना ही चाहते हैं तो इस यज्ञ को कीजिये महात्मा इन्द्र के विषय में यह प्राचीन वृत्तान्त सुनने में आता है कि जब इन्द्र को ब्रह्महत्या लगी थी, तब वे अश्वमेघ यज्ञ करके ही पवित्र हुये थे श्री राम द्वारा पूरी कथा पूछने पर लक्ष्मण बोले प्राचीनकाल में वृत्रासुर नामक असुर पृथ्वी पर पूर्ण धार्मिक निष्ठा से राज्य करता था एक बार वह अपने ज्येष्ठ पुत्र मधुरेश्वर को राज्य भार सौंपकर कठोर तपस्या करने वन में चला गया उसकी तपस्या से इन्द्र का भी आसन हिल गया वह भगवान विष्णु के पास जाकर बोले कि प्रभो तपस्या के बल से वृत्रासुर ने इतनी अधिक शक्ति संचित कर ली है कि मैं अब उस पर शासन नहीं कर सकता यदि उसने तपस्या के फलस्वरूप कुछ शक्ति और बढ़ा ली तो हम सब देवताओं को सदा उसके आधीन रहना पड़ेगा। इसलिये प्रभो आप कृपा करके सम्पूर्ण लोकों को उसके आधिपत्य से बचाइये। किसी भी प्रकार उसका वध कीजिये ओर इंद्र के द्वारा दधीचि की हड्डियो से बने वज्र से उसका बध किया गया।

















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