इन्द्र का अहंकार दूर करने भगवान ने उठाया गौवर्धन पर्वत - आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज
दमोह आशुतोष गौतम :ग्राम बरखेरा बैस मे चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पांचवे दिवस मे कथा सुनाते हुए आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने कहा समस्त वृंदावनवासी इन्द्र देव की पूजा करने की तैयारी कर रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण के पूछने पर बताया कि इन्द्रदेव बारिस करवाते है इसलिए हम सब मिलकर इन्द्र की पूजा करते है।
तब श्री कृष्ण ने कहा कि वर्षा करना तो इंद्रदेव का कर्तव्य है। यदि पूजा करनी है तो हमें गोवर्धन पर्वत की करनी चाहिए, क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं और हमें फल-फूल, सब्जियां आदि भी गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होती हैं। इसके बाद सभी ब्रजवासी इंद्रदेव की बजाए गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। इस बात को देवराज इंद्र ने अपना अपमान समझा और क्रोध में आकर प्रलयदायक मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। जिससे हर ओर त्राहि-त्राहि होने लगी। सभी अपने परिवार और पशुओं को बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। तब ब्रजवासी कहने लगे कि यह सब कृष्णा की बात मानने का कारण हुआ है, अब हमें इंद्रदेव का कोप सहना पड़ेगा।
भगवान कृष्ण ने इंद्रदेव का अंहकार दूर करने और सभी ब्रजवासियों की रक्षा करने हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया। तब सभी ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली। इसके बाद इंद्रदेव को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने श्री कृष्ण से क्षमा याचना की। इसी के बाद से गोवर्धन पर्वत के पूजन की परंपरा आरंभ हुई।

















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