जालबांधा में आयोजित पांच दिवसीय रामकथा समागम का संगीत मय समापन
अपने से श्रेष्ठ के चरित्र पर कभी शंका नहीं की जा सकती- राजन महाराज
खैरागढ़ | ब्लाक के जालबांधा में आयोजित पांच दिवसीय रामकथा समागम का सोमवार को समापन हुआ। कलकत्ता से पहुँचें सुप्रसिद्ध कथा वाचक पं. राजन महाराज की कथा सुनवें रोजाना यहाँ बड़ी संख्या में श्रोता पहुँचें । रामचरित के सुंदर आख्यान से श्रद्धालु आनंदित होते रहे । मिहिर झा के संयोजन व सरपंच दीनदयाल सिन्हा सहित ग्रामीणों के अथक प्रयास से आयोजित रामकथा समागम में क्षेत्र के सांसद संतोष पांडेय, विधायक भुनेश्वर बघेल, कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त धनेश पाटिला, राजगामी अध्यक्ष विवेक वासनिक, प्रदेश कांग्रेस सचिव निलेन्द्र शर्मा, जिला कांग्रेस अध्यक्ष पदम कोठारी, पूर्व विधायक गिरवर जंघेल, कोमल जंघेल, जिपं उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह, सभापति घम्मन साहू, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष यशोदा निलाम्बर वर्मा, प्रोफेशनल्स कांग्रेस के जिला अध्यक्ष उत्तम सिंह, कांग्रेस नेता सुदेश देशमुख, कुतुबुद्दीन सोलंकी, रमेश डाकलिया, ओम झा, सुनीलकांत पांडेय, समाजसेवी शैलेष मिश्रा, डॉ. प्रशांत झा, भागवतशरण सिंह, विनोद जैन, मिनेश साहू, शिवकुमार वर्मा, भगवताचार्य भगवती शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। इस दौरान पं. राजन जी महाराज ने रामचरित के विविध प्रसंगों का सस्वर सुंदर बखान करते हुये आज के विषम दौर में जीवन को सुगम बनाने की प्रेरणा दी
अपने से श्रेष्ठ के चरित्र पर कभी शंका नहीं की जा सकती- राजन महाराज
रामकथा समागम में विविध प्रसंगों का उद्धरण देते हुये कथा वाचक पं.राजन महाराज ने कहा कि जिस तरह भरत के चरित्र पर कभी शंका नहीं की जा सकती वैसे ही अपने जीवन में अपने से श्रेष्ठ के चरित्र पर भी कभी शंका नहीं की जानी चाहिये । हमारे श्रेष्ठ हमेशा अनुशरण करना चाहिये । उन्होंने कहा कि जिस तरह से भगवान राम सहित भरत, शत्रुहन व माता सीता ने अपनी विपरीत परिस्थितियों को श्रेष्ठ मानकर श्रेष्ठ चरित्र का उदाहरण प्रस्तुत किया हमें भी अपनी विपरीत परिस्थितियों को श्रेष्ठ मानकर आगे बढ़ना चाहिये । भरत प्रसंग का उल्लेख करते हुये बताया गया कि कैकयी द्वारा पुत्र प्रेम में राम के वनवास मांगे जाने के पश्चात भरत जी विचलित हो गये लेकिन रामचरितमानस हमे शिक्षा देता है कि इस विषम परिस्थिति में भी सबके चरित्र का उद्धार किया और देश व देश की जनमानस को एक सूत्र दिया कि किसी भी परिवार में भाई के हक को छीना नहीं जाना चाहिये अन्यथा इसका परिणाम बहुत बुरा होता है। और परिवार को कष्ट भोगना पड़ता है. पं. राजन जी ने बताया कि कैकयी के लालच के कारण आज तक संपूर्ण संसार में किसी ने भी अपनी पुत्री का नाम कैकयी नहीं रखा।
पुण्य का जड़ पाताल में और पाप का जड़ अस्पताल में
विविध प्रसंगों के माध्यम से कथा वाचक पं. राजन महाराज ने बताया कि पुण्य की जड़ हमेशा पाताल में ही होती है लेकिन पाप की जड़ हमें अस्पताल तक ले जाती है। श्रोता श्रद्धालुओं को समझाते हुये कहा कि अवैधानिक तरीके से कोई कितनी भी संपत्ति अर्जित कर ले वह सुखी नहीं रह सकता, गलत कार्यों का गलत ही परिणाम भोगना पड़ता है इसलिये कलयुग में पापाचार के कारण रोग व्याधियों में वृद्धि हुई है । पुण्य से अर्जित संपत्ति व्यक्ति को आगे बढ़ाती है वहीं गलत तरीके से संपत्ति का अर्जन हमें अहंकार की ओर ले जाता है । अहंकार जब भी जीवन में प्रवेश करे हमें दंडवत हो जाना चाहिये वहीं उन्होंने रामायण के प्रसिद्ध भक्त शिरोमणी केंवट प्रसंग का मार्मिक उद्धरण देते हुये कहा कि ईश्वर के सामने कभी जाति का भेद नहीं रहता, ऊंचे और नीचे का भेद हमने बनाया है, जिस तरह से प्रभु राम नेभक्त केंवटराज को अपने से गले से लगाया और सबरी के जूठे बेर खाये उन्होंने उस युग में हो ऊंच नीच के बंधन को तोड़कर समाज का पथ प्रदर्शन किया । हम राम को मानते हैं और मन में भेदभाव रखते हैं तो राम हमारा कल्याण नहीं कर सकते। इस दौरान पं. राजन महाराज के संगीतमय सुमधुर भजनों ने भी श्रोताओं को बांधे रखा।
*सीएनआई खैरागढ़ से सोमेश कुमार की रिपोर्ट*

















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