" रावन कौन" (रचना लखन लहरिया)
तंहू रावन मंहू रावन बतावव येहू रावन ओहू रावन
फेर काबर हर साल भैय्या रावन के पुतला जलावन
छल कपट ईरखा ला छोड़व
भाईचारा से तुम नता जोड़व
जात पात के भेदभाव मिटाके
उपजत पाप के गगरी फोडव
गांव गांव चलव गली गली सुनता के दिया जलावन।
तंहू रावन मंहू रावन बतावव येहू रावन ओहू रावन
फेर काबर हर साल भैय्या रावन के पुतला जलावन।।
बेटी बहु के इज्जत लुटावत हे
दुराचारी अन्यायी मेछरावत हे
कानून घलो पैसा मां बिक जाथे
नेता के शरण दोषी पलपलावत हे
कानून सत्ता ला संगठित होके,संघर्ष करन दुत्कारन।
तंहू रावन मंहू रावन बतावव येहू रावन ओहू रावन।
फेर काबर हर साल भैय्या रावन के पुतला जलावन।।
स्वारथ में सब मनखे जीयत हे
आदमी के खून आदमी पीयत हे
धरम करम के आड़ मां बईठे
चोर उचक्का के डोलत नियत हे
मन के ऐसन दुराभाव ला अपन होके खुद भगावन।।
तंहू रावन मंहू रावन बतावव येहू रावन ओहू रावन।।
रचना
लखन" लहरिया"
आप सभी को असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक पर्व विजयादशमी (दशहरा)की असीम शुभकामनाएं आपका जीवन मंगलमय हो।
*मोहला से योगेन्द्र सिंगने की रिपोर्ट*


















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