गणतंत्र दिवस आज
भारत के उन राष्ट्रीय पर्वों में से है, जिनका महत्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी। 26 जनवरी वह दिन है, जब भारत ने यह स्पष्ट किया कि यह देश किसी शासक, वंश या सत्ता के भरोसे नहीं चलेगा,
बल्कि अपने संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ेगा। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि आज़ादी के बाद सबसे बड़ी चुनौती स्वतंत्र देश को एक स्थायी, न्यायपूर्ण और समान व्यवस्था देना था, और उसी चुनौती का उत्तर भारतीय संविधान बना।
गणतंत्र दिवस वह दिन है जब भारत में औपचारिक रूप से भारतीय संविधान लागू हुआ। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस समय भारत को चलाने के लिए स्थायी संविधान मौजूद नहीं था। शुरुआती वर्षों में अस्थायी कानूनों और ब्रिटिश शासन से मिले ढाँचों के सहारे काम चलाया गया।
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद भारत एक गणराज्य बना, जिसका मतलब है कि देश का सर्वोच्च पद किसी वंशानुगत राजा के पास नहीं, बल्कि संविधान द्वारा तय व्यवस्था के अनुसार चुने गए प्रतिनिधियों के पास होता है। सरल भाषा में कहें तो गणतंत्र दिवस वह दिन है जब भारत ने यह तय किया कि यहाँ शासन व्यक्ति नहीं, नियम करेंगे। यही कारण है कि यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतना का प्रतीक भी है।
गणतंत्र शब्द दो हिस्सों से मिलकर बना है—“गण” और “तंत्र”। गण का अर्थ है जनता और तंत्र का अर्थ है व्यवस्था। यानी ऐसी शासन प्रणाली जहाँ सत्ता का असली स्रोत जनता होती है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश के लिए यह व्यवस्था सबसे उपयुक्त मानी गई, क्योंकि यहाँ हर वर्ग, हर समुदाय और हर विचार को साथ लेकर चलना ज़रूरी था।
भारत ने गणतंत्र इसलिए चुना ताकि कोई भी व्यक्ति या संस्था संविधान से ऊपर न हो। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि कानून सबके लिए समान हों, चाहे वह आम नागरिक हो या सत्ता में बैठा व्यक्ति। यही विचार भारत को एक मजबूत लोकतंत्र बनाता है और यही कारण है कि गणतंत्र दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक विचारधारा का उत्सव है।
यह त्योहार क्यों मनाया जाता है?
गणतंत्र दिवस मनाने का उद्देश्य केवल संविधान लागू होने की याद नहीं है, बल्कि उस सोच को ज़िंदा रखना है, जिस पर भारत टिका है। यह दिन हर पीढ़ी को यह याद दिलाने के लिए मनाया जाता है कि देश की एकता और स्थिरता कानून, समानता और न्याय पर आधारित है। यह त्योहार हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है, जब नागरिक जागरूक हों और अपने कर्तव्यों को समझें। गणतंत्र दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकारों का नाम नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रक्रिया है। यही वजह है कि यह पर्व हर साल नए संदर्भों और नई चुनौतियों के साथ और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
26 जनवरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
26 जनवरी की तारीख भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ी हुई है। 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसी दिन पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी। उस समय यह निर्णय अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ भारत की स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतीक था।
जब संविधान लागू करने की तारीख तय की गई, तब 26 जनवरी को चुनने के पीछे यही भावना थी कि स्वतंत्रता आंदोलन की उस ऐतिहासिक प्रतिबद्धता को सम्मान दिया जाए। इस तरह 26 जनवरी केवल एक संवैधानिक तारीख नहीं, बल्कि आज़ादी के संघर्ष से जुड़ा हुआ एक भावनात्मक प्रतीक भी बन गया।
संविधान निर्माण की लंबी यात्रा
भारतीय संविधान का निर्माण कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था। यह लगभग तीन साल की लंबी बहस, विचार-विमर्श और अनुभवों का परिणाम था। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रतिनिधियों ने अपने समाज, संस्कृति और समस्याओं को सामने रखकर संविधान के हर अनुच्छेद पर चर्चा की।
संविधान केवल कानूनों की किताब नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दस्तावेज़ है। इसमें भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा ढाँचा तैयार किया गया, जो समय के साथ बदलती ज़रूरतों को भी स्वीकार कर सके। यही लचीलापन भारतीय संविधान की सबसे बड़ी ताकत है।
गणतंत्र दिवस का आयोजन पूरे देश में होता है, लेकिन दिल्ली का मुख्य समारोह विशेष महत्व रखता है। राष्ट्रपति द्वारा ध्वजारोहण के बाद कर्तव्य पथ पर भव्य परेड आयोजित की जाती है। इस परेड में थलसेना, नौसेना और वायुसेना की टुकड़ियाँ अपने अनुशासन और सामर्थ्य का प्रदर्शन करती हैं।
इसके साथ ही विभिन्न राज्यों की झांकियाँ भारत की सांस्कृतिक विविधता और विकास की झलक दिखाती हैं। स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी संस्थानों में भी झंडा फहराया जाता है और देशभक्ति कार्यक्रम होते हैं। इस तरह गणतंत्र दिवस केवल एक सरकारी समारोह नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक भागीदारी का पर्व बन जाता है।
युवाओं के लिए गणतंत्र दिवस: अधिकार से आगे जिम्मेदारी
युवा वर्ग अक्सर बदलाव का वाहक माना जाता है। गणतंत्र दिवस उन्हें यह याद दिलाता है कि बदलाव केवल मांगने से नहीं, बल्कि भागीदारी से आता है। मतदान, कानून का सम्मान, और समाज के मुद्दों पर रचनात्मक संवाद—ये सभी लोकतंत्र की रीढ़ हैं। युवाओं के लिए यह पर्व प्रेरणा है कि वे केवल आलोचक न बनें, बल्कि समाधान का हिस्सा भी बनें।
करियर, शिक्षा और अवसरों की दुनिया में आगे बढ़ते युवाओं के लिए संविधान समान अवसर की गारंटी देता है। गणतंत्र दिवस इस गारंटी को समझने और उसकी रक्षा करने की प्रेरणा देता है। यह दिन बताता है कि व्यक्तिगत सफलता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।



















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