निनवा मे भव्य कलश यात्रा के साथ प्रारम्भ हुई श्रीमद भागवत कथा..
भागवत कथा से दूर होते है मन के विकार -- आचार्य नंदकुमार शर्मा
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अजय नेताम =तिल्दा नेवरा = समीपस्थ ग्राम. निनवा मे 19 जनवरी से 26 जनवरी तक श्रीमद भागवत कथा आयोजन किया गया है. भागवत कथा के आचार्य परम श्रद्धेय पंडित नंदकुमार शर्मा निनवा ( तिल्दा) वाले है. भागवत कथा के प्रथम दिन सोमवार को भव्य कलश यात्रा के साथ भागवत कथा का शुभारंभ किया गया ।
आचार्य शर्मा जी ने कहा कि जन्मांतरे भवेत पुण्यं तदा भागवतं लभेत! अर्थात जन्म-जन्मांतर एवं युग-युगांतर में जब पुण्य का उदय होता है तब जीव को भागवत कथा श्रवण का सुअवसर प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने मात्र से ही कट जाते हैं जीव के सारे पाप। व्यासपीठ से कथा का महत्व समझाते हुए आचार्य जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा एक अमर कथा है। इसे सुनने से पापी से पापी व्यक्ति भी पाप से मुक्त हो जाता है। वेदों का सार युगों-युगों से मानव जाति तक पहुंचता रहा है। भागवत महापुराण यह उसी सनातन ज्ञान की पयस्विनी है जो वेदों से प्रवाहित होती चली आ रही है। इसीलिए भागवत महापुराण को वेदों का सार कहा गया है।उन्होंने श्रीमद् भागवत महापुराण की व्याख्या करते हुए बताया कि श्रीमद् भागवत अर्थात जो श्री से युक्त है, श्री अर्थात चैतन्य, सौंदर्य, ऐश्वर्या, भागवतः प्रोक्तम् इति भागवत भाव कि वो वाणी, जो कथा जो हमारे जड़वत जीवन में चैतन्यता का संचार करती है। जो हमारे जीवन को सुंदर बनाती है वो श्रीमद्भागवत कथा जो सिर्फ मृत्युलोक में ही संभव है। और साथ ही यह एक ऐसी अमृत कथा है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है इसलिए परीक्षित ने स्वर्ग अमृत के बजाए कथामृत का वरण किया। कथा रूपी अमृत का पान करने से संपूर्ण पापों का नाश होता है। उन्होंने बताया कि भागवत कथा मे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य तीनों का समावेश है. कथा के दौरान उन्होंने वृंदावन का अर्थ बताते हुए कहा कि वृंदावन इंसान का मन है। कभी-कभी इंसान के मन में भक्ति जागृत होती है। परंतु वह जागृति स्थाई नहीं होती। इसका कारण यह है कि हम ईश्वर की भक्ति तो करते हैं पर हमारे अंदर वैराग्य व प्रेम नहीं होता है। इसलिए वृंदावन में जाकर भक्ति देवी तो तरुणी हो गई, पर उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य अचेत और निर्बल पड़े रहते हैं। इसमें जीवन्तता और चैतन्यता का संचार करने हेतु नारद जी ने भागवत कथा का ही अनुष्ठान किया।. आगे आचार्य जी गोकर्ण महात्म्य की कथा सुनाते हुए कहा कि आत्मदेव ब्राह्मण का पुत्र धुंधुकारी, जो कि मरणोपरांत एक भयंकर प्रेत बन गया. जिनकी मुक्ति के लिए गोकर्ण जी ने भागवत कथा का आयोजन किया. और भागवत कथा सुनने मात्र से उस भयंकर प्रेत की मुक्ति हो गई. आचार्य शर्मा ने कहा कि भागवत कथा ऐसी कथा है जिनके श्रवण मात्र से बड़े से बड़े पापी का भी उद्धार हो जाता. उन्होंने कहा कि भागवत कथा ही साक्षात कृष्ण है और जो कृष्ण है, वही साक्षात भागवत है। भागवत कथा भक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। भागवत कथा एक कल्पवृक्ष की भांति है जिनसे व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है. उन्होंने लोगों से भक्ति मार्ग से जुड़ने और सत्कर्म करने को कहा। कथा श्रवण करने मनुष्य में धार्मिक आस्था जागृत होती है। दुर्गुणों की बजाय सद्गुणों के द्वार खुलते हैं। यज्ञ से देवता प्रसन्ना होकर मनवांछित फल प्रदान करते हैं। उन्होंने बताया कि भागवत कथा के श्रवण से व्यक्ति भव सागर से पार हो जाता है। श्रीमद भागवत से जीव में भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य के भाव उत्पन्ना होते हैं। इसके श्रवण मात्र से व्यक्ति के पाप पुण्य में बदल जाते हैं। विचारों में बदलाव होने पर व्यक्ति के आचरण में भी स्वयं बदलाव हो जाता है।



















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