ढुण्ढिराज गणेश चतुर्थी आज-भगवान श्रीगणेश जी की पूजा-अर्चना से सभी पापों का नाश होता है, और पुण्य की प्राप्ति होती है।
सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी।
ढुण्डिराज चतुर्थी हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व माना जाता है। इसे मनोरथ चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भक्तजन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि गणेशजी की भक्ति भाव से की गई प्रार्थनाओं से सभी मनोरथ पूरे होते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का प्रवेश होता है। इस अवसर पर लोग अपने घरों और मंदिरों में विशेष पूजा विधि के साथ गणेशजी की आराधना करते हैं।
इस वर्ष ढुण्डिराज चतुर्थी 21 फरवरी 2026 को पड़ रही है। इस दिन शुभ, शुक्ल और रवि योग का संयोग बन रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और भी बढ़ाता है। भक्तजन पूरे मन और श्रद्धा के साथ भगवान गणेश के सामने पूजा करते हुए अपने जीवन में खुशहाली, सफलता और मानसिक संतुलन की कामना करेंगे। यह दिन विशेष रूप से आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होता है और इसे मनाने से परिवार और व्यक्तिगत जीवन दोनों में सकारात्मक बदलाव आने की मान्यता है।
ढुण्डिराज चतुर्थी तिथि
द्रिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी 20 फरवरी 2026 को दोपहर 2:37 बजे से आरंभ होगी। यह तिथि अगले दिन यानी 21 फरवरी 2026 को दोपहर 1:00 बजे समाप्त होगी। इसी कारण 21 फरवरी को पूरे देश में ढुण्डिराज चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। । यह दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की जाती है।
ढुण्डिराज चतुर्थी का धार्मिक महत्व अत्यंत बड़ा है। यह पर्व भगवान गणेश के ढुण्डिराज स्वरूप की विशेष पूजा से जुड़ा है, जिन्हें भक्त अपनी सभी इच्छाओं और मनोरथों की पूर्ति करने वाला मानते हैं। मत्स्य पुराण में इसे मनोरथ चतुर्थी कहा गया है, और मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। गणेश जी को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माना जाता है, इसलिए उनकी आराधना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और खुशहाली आती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो नई शुरुआत कर रहे हैं – जैसे नया व्यवसाय, शिक्षा या विवाह। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि इस व्रत से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। वाराह पुराण में इसे अविघ्नकर व्रत कहा गया है, जिसे चार महीने तक रखा जाता है और आषाढ़ में इसका उद्यापन किया जाता है। पुराणों के अनुसार, राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की सफलता के लिए, भगवान शिव ने त्रिपुरासुर से युद्ध से पहले और भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन से पहले इस व्रत का पालन किया था। इससे स्पष्ट होता है कि यह व्रत केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा भी किए जाने वाला पवित्र कर्म है।


















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