“74:26 का हिसाब गड़बड़ कैसे हुआ,
बजट चर्चा में विधायक मांगे सरकार से जवाब
10 हजार करोड़ के बकाया पर हो खुली बहस — नामदेव ।
सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी। रायपुर-छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र वर्तमान में जारी है और बजट पर विस्तृत चर्चा होना शेष है। इस महत्वपूर्ण अवसर पर भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ, छत्तीसगढ़ प्रदेश के राष्ट्रीय महामंत्री एवं प्रदेश अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने सत्तापक्ष और विपक्ष के सभी विधायकों से अपील की है
कि वे मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ को प्राप्त होने वाले 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक के लंबित बकाया के मुद्दे को विधानसभा में प्रमुखता से उठाएं।
नामदेव ने कहा कि मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49(6) के तहत पेंशन संबंधी दायित्वों का वहन 74:26 के अनुपात में तय किया गया है, जिसमें 74 प्रतिशत हिस्सा मध्यप्रदेश तथा 26 प्रतिशत हिस्सा छत्तीसगढ़ को वहन करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ सरकार अपने हिस्से की 26 प्रतिशत राशि नियमित रूप से मध्यप्रदेश को देती रही है, लेकिन मध्यप्रदेश द्वारा अपने हिस्से की 74 प्रतिशत राशि का भुगतान नहीं किया गया, जिसके कारण यह बकाया राशि बढ़ते-बढ़ते 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गई है।
उन्होंने कहा कि इस गंभीर तथ्य का खुलासा स्वयं राज्य के वित्त मंत्री ओ पी चौधरी ने विधानसभा के चालू बजट सत्र के दौरान किया है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह स्थिति कब, कैसे और किन कारणों से बनी। साथ ही यह भी नहीं बताया गया कि छत्तीसगढ़ को यह बड़ी राशि कब और किस प्रक्रिया से प्राप्त होगी।
नामदेव ने सवाल उठाते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर पूर्ण जानकारी सामने नहीं आना कई शंकाओं को जन्म देता है। उन्होंने यह भी आशंका व्यक्त की कि कहीं ऐसा तो नहीं कि दोनों राज्यों में एक ही दल की सरकार होने के कारण इस मुद्दे को गंभीर चर्चा से दूर रखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों पेंशनरों और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा मामला है, इसलिए इसकी पूरी सच्चाई सामने आना अत्यंत आवश्यक है।
महासंघ ने सभी विधायकों से आग्रह किया है कि वे बजट चर्चा के दौरान सरकार से स्पष्ट प्रश्न करें—
यह बकाया राशि किन परिस्थितियों में इतनी अधिक हो गई?
इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं?
अब तक इसकी वसूली के लिए क्या प्रयास किए गए हैं?
छत्तीसगढ़ को यह राशि कब और कैसे प्राप्त होगी?
भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या ठोस तंत्र बनाया जाएगा?
नामदेव ने कहा कि विधानसभा लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है और ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर यदि वहां भी गंभीर चर्चा नहीं होती, तो यह जनहित की उपेक्षा होगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश के हित में सभी जनप्रतिनिधियों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस विषय पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, ताकि वास्तविकता सामने आए और दोषियों की जवाबदेही तय हो सके।
महासंघ ने अंत में कहा कि यह केवल वित्तीय समायोजन का विषय नहीं, बल्कि लाखों पेंशनरों के विश्वास और अधिकारों से जुड़ा मामला है। इसलिए सरकार को इस पर पारदर्शी, समयबद्ध और ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।



















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