बिलाईगढ़ महाविद्यालय में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार हुआ संपन्न
शासकीय शहीद वीर नारायण सिंह महाविद्यालय बिलाईगढ़ में हिंदी विभाग द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार 'राष्ट्रीय चेतना के महाकवि मोहनलाल महतो वियोगी' विषय पर आयोजित किया गया। इस वेबीनार में छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों के आमंत्रित विद्वानों का सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत हुआ। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तर प्रदेश बिहार, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, दिल्ली आदि कई राज्यों के लगभग 200 प्रतिभागी जुड़े रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय की छात्रा ममता साहू एवं उनके साथियों द्वारा सरस्वती वंदना से हुआ। स्वागत भाषण एवं वेबीनार की पृष्ठभूमि पर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ उमाकांत मिश्र द्वारा प्रकाश डाला गया। बीज वक्तव्य के रूप में झारखंड के अवकाश प्राप्त व्याख्याता डॉ मणिकांत मिश्र ने वियोगी जी के समग्र साहित्य पर प्रकाश डाला एवं साहित्य व राष्ट्रीयता को केंद्र में रखकर संवेदना भाव को व्यक्त करने में महाकवि मोहनलाल महतो वियोगी की सफलता को उन्होंने वर्णित किया। आर्यावर्त महाकाव्य में राष्ट्रीय चेतना को उन्होंने रेखांकित किया। आमंत्रित वक्ता डॉ उमाशंकर सिंह हिंदी विभाग, अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज गया (बिहार) ने आर्यावर्त महाकाव्य को ऋग्वेद की तरह महत्वपूर्ण बतलाया, उन्होंने भी वियोगी जी की लेखनी को बहु आयामी एवं जनमानस की आवाज के रूप में निरूपित किया। राष्ट्रीयता, उत्सर्ग और साहित्यिकता की त्रिवेणी वियोगी जी की कविता में प्रवाहित है। गया बिहार के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ रामकृष्ण ने बतलाया कि वियोगी जी ने काव्य का आरंभ ब्रजभाषा में 'छवीनाथ' उपनाम से किया था। व्यंग्य चित्रकार के रूप में भी वे प्रतिष्ठित थे। काव्य की अपेक्षा उनका गद्य संसार बहुत बड़ा है। 'महामंत्री' उपन्यास का उल्लेख करते हुए उन्होंने वियोगी जी को हिंदी साहित्य के लिए वरदान बताया। वियोगी साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉ सच्चिदानंद प्रेमी ने वियोगी जी को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें प्रसाद व निराला जी की भांति बड़ा नाम बताया। वियोगी जी के साथ बिताए अनेक संस्मरणों को उन्होंने रेखांकित किया। युद्ध के लिए वही धरती सही है जहां संस्कार समाप्त हो जाती है। 'सूखी धरती' रचना के माध्यम से उन्होंने व्याख्यायित किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के प्राध्यापक एवं भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक डॉ प्रभाकर सिंह ने स्पष्ट किया कि हिंदी में क्षेत्रीयता एवं विभिन्न वादों की प्रबलता के कारण वियोगी जी जैसे बड़े साहित्यकार पर्याप्त ख्याति नहीं प्राप्त कर सके। वियोगी जी का मन देशज था, वे स्वाभिमानी तथा गौरव से परिपूर्ण थे, अपने को विज्ञापित करना उन्हें स्वीकार नहीं था। सामाजिक उपन्यासों में जीवन के यथार्थ को उन्होंने स्थापित किया। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामंती समाज में भी मनुष्यता को स्थापित करने में वियोगी जी को सफलता मिली। अध्यक्षीय उद्बोधन में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ उमाकांत मिश्र ने मोहनलाल महतो वियोगी को जयशंकर प्रसाद के समतुल्य महाकवि बताया। आर्यावर्त महाकाव्य को अमिताक्षर छंद में रचित प्रथम काव्य का गौरव प्राप्त है। डॉ मिश्र ने आर्यावर्त को नवजीवन का संचार करने वाला प्रगतिवादी महाकाव्य बतलाया। बाल साहित्य के रूप में वियोगी जी द्वारा रचित नवरत्न, कथा कहानी, सीख की बातें, आदि उदाहरण देकर उनके बाल साहित्य पर प्रकाश डाला। वियोगी जी संस्कृत, हिंदी, पाली, मराठी, बंगाली आदि अनेक भाषाओं के जानकार थे और बच्चों को राष्ट्र की नींव निरूपित करते थे। धन्यवाद ज्ञापन के क्रम में कार्यक्रम संयोजक हिंदी विभागाध्यक्ष श्रीमती सुनीता विक्रम कोशले ने मोहनलाल महतो वियोगी के कार्टूनिस्ट रूप का स्मरण दिलाया। वक्तव्य प्रस्तुत कर रहे विद्वानों की प्रशंसा करते हुए वियोगी जी के समृद्ध साहित्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया और समस्त अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। हेमचंद विश्वविद्यालय के शोध छात्र श्री शालीन साहू ने वियोगी जी की जन्मस्थली गया जाने का स्मरण सुनाया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना को रेखांकित करते हुए वियोगी जी की पंक्तियों को प्रस्तुत किया "उदय हुआ रवि दिव्य राष्ट्र धर्म का, आज राष्ट्रीयता ही श्रेष्ठ आर्य धर्म है।" आयोजन में फीडबैक के रूप में डॉ रीता यादव, डॉ वाल्मीकि साहू, मध्य प्रदेश के प्राध्यापक डॉ मनोज सिन्हा, वाराणसी के शोध छात्र तथादी, हैदराबाद की आरती, खैरागढ़ के अतिथि व्याख्याता डॉ कुमुद रंजन मिश्रा ने वेबीनार को अत्यंत सार्थक व सफल बतलाएं। कार्यक्रम के संचालक शोध छात्र श्री दीपक कुमार तिवारी को भी भरपूर सराहना मिली। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, व्याख्याता, शोध छात्र आदि अंत तक जुड़े रहकर कार्यक्रम को सफल बनाए। महाविद्यालय के हिंदी विभाग के श्री रेशम चौहान एवं एम ए के सभी छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकगण एवं कर्मचारियों का सहयोग रहा।


















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