भोरमदेव महोत्सव के अस्तित्व पर संकट: तीन दिन से घटकर महज एक दिन का रह गया आयोजन, जनभावनाओं में भारी आक्रोश
कवर्धा। छत्तीसगढ़ के खजुराहो के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक नगरी भोरमदेव में आयोजित होने वाला 'भोरमदेव महोत्सव' अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिस महोत्सव की गूंज कभी तीन दिनों तक पूरे प्रदेश में सुनाई देती थी, उसे शासन-प्रशासन की उपेक्षा ने अब महज एक दिन के रस्म अदायगी में समेट दिया है। प्रशासन के इस निर्णय को स्थानीय जनता और संस्कृति प्रेमियों ने 'परंपरा के साथ खिलवाड़' करार दिया है।
परंपराओं का गला घोंट रहा प्रशासन?
भोरमदेव महोत्सव केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की आस्था, संस्कृति और पारंपरिक पहचान का प्रतीक है। दशकों से यह उत्सव तीन दिनों तक पूरी भव्यता के साथ मनाया जाता रहा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में इसे घटाकर दो दिन किया गया, और इस वर्ष तो हद ही हो गई जब इसे मात्र एक दिन के लिए सीमित कर दिया गया है।
क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन धीरे-धीरे इस महोत्सव की चमक फीकी कर रहा है। लोगों के मन में अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है: "क्या आने वाले वर्षों में भोरमदेव महोत्सव को पूरी तरह बंद करने की साजिश रची जा रही है?"
एक तरफ करोड़ों का कॉरिडोर, दूसरी तरफ महोत्सव की कटौती
हैरानी की बात यह है कि एक ओर केंद्र सरकार ने भोरमदेव मंदिर के जीर्णोद्धार और भव्य 'भोरमदेव कॉरिडोर' के निर्माण के लिए 146 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की है। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच महोत्सव के दिनों में कटौती करना राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विरोध के मुख्य बिंदु:
आस्था से खिलवाड़: महाशिवरात्रि और चैत्र माह के इस पावन अवसर पर होने वाले आयोजन को छोटा करना श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करना है।
पर्यटन को नुकसान: महोत्सव छोटा होने से दूर-दराज से आने वाले पर्यटकों और कलाकारों का उत्साह कम होगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।
प्रशासनिक उदासीनता: करोड़ों की राशि होने के बावजूद सांस्कृतिक आयोजन के लिए समय और संसाधन की कमी बताना तर्कहीन प्रतीत होता है।
जनता की मांग: वापस मिले तीन दिवसीय गौरव
सोशल मीडिया से लेकर कवर्धा की सड़कों तक इस निर्णय का पुरजोर विरोध शुरू हो गया है। स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि प्रशासन की यही कार्यप्रणाली रही, तो छत्तीसगढ़ की यह गौरवशाली विरासत इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाएगी।
"भोरमदेव हमारी पहचान है। इसे एक दिन का इवेंट बना देना हमारी संस्कृति का अपमान है। शासन को तुरंत अपना निर्णय बदलना चाहिए।" — स्थानीय नागरिक एवं संस्कृति प्रेमी
CNI NEWS कवर्धा छत्तीसगढ़ से अनवर खान की रिपोर्ट


















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