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Friday, March 20, 2026

मनुष्य को भय से मुक्त कराती है देवी भागवत कथा - पं० नरेश तिवारी

 मनुष्य को भय से मुक्त कराती है देवी भागवत कथा - पं० नरेश तिवारी 



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


कोरबा - श्रीमद्देवी भागवत पुराण हिन्दू धर्म के अठारह महापुराणों में से एक है। यह ग्रंथ मुख्य रूप से देवी उपासना और आद्या शक्ति की सर्वोच्चता को प्रस्तुत करता है। अन्य पुराणों की तुलना में यह विशेष रूप से स्त्री शक्ति पर केन्द्रित है।


यह पुराण ब्रह्मा , विष्णु और महेश जैसे देवताओं को भी शक्ति की उपज मानता है। अर्थात शक्ति ना केवल सृजन करती है , बल्कि पालन और संहार भी उसी से संचालित होता है। यह ग्रंथ देवी की उत्पत्ति , अवतार , लीलाओं , भक्तों की कहानियों और आध्यात्मिक उपदेशों से भरपूर हैं। जब मनुष्य जीवन के दुखों से घिरकर जीने की आशा छोड़ देता है , तब श्रीमद्देवीभागवत की कथा उसे नई राह दिखाती है। यह कथा मनुष्य को भय से मुक्त करती है और अंततः हरि के परम पद को प्राप्त कराती है।

                                                उक्त बातें चैत्र नवरात्रि में शारदा बिहार वार्ड नंबर 12 में आयोजित संगीतमयी श्रीमद्देवीभागवत कथा के प्रथम दिवस भागवताचार्य पं० नरेश तिवारी (लाखासर वाले) ने श्रद्धालुओं को कथा का महत्व बताते हुये कही। उन्होंने कहा कि देवी भागवत पुराण में वर्णित मत्स्योपाख्यान (मत्स्यावतार कथा) भगवान विष्णु की शक्ति स्वरूपा देवी महामाया की महिमा को दर्शाता है , जिसमें प्रलय के समय एक छोटी मछली (मत्स्य) राजा सत्यव्रत (मनु) को ज्ञान देती है और महासागर में आश्रय प्रदान कर रक्षा करती है। यह कथा सृष्टि के पुनर्सृजन और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति से संबंधित है। मत्स्यावतार  कथा का विस्तार से वृत्तांत सुनाते हुये आचार्यश्री ने बताया कि राजा सत्यव्रत (मनु) जब नदी में तर्पण कर रहे थे , तब एक छोटी मछली ने उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाई। राजा ने उसे अपने कमंडल में ले लिया। वह मछली पल भर में ही कमंडल से बड़ी , फिर सरोवर से बड़ी और अंत में समुद्र जितनी विशाल हो गई। इससे राजा को आभास हुआ कि यह कोई साधारण जीव नहीं , बल्कि साक्षात विष्णु रूप है। मत्स्य रूपी भगवान ने राजा को प्रलय आने की सूचना दी और उन्हें एक विशाल नाव बनाने का निर्देश दिया , जिसमें वे सभी ऋषियों , औषधियों और सप्तऋषियों को लेकर सुरक्षित रहें। प्रलय के समय जब नाव डूबने लगी , तब मत्स्य भगवान ने स्वयं को वासुकी नाग (रस्सी के रूप में) और ऋषियों की सहायता से नाव को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। आचार्यश्री ने बताया कि इस कथा में देवी भगवती की शक्ति का वर्णन है , जो मत्स्य रूप में ज्ञान और रक्षा प्रदान करती है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में श्रद्धालुओं को मां दुर्गा के 108 शक्तिपीठों के दर्शन कथा के माध्यम से करने का सौभाग्य मिलेगा। कथा के प्रथम दिवस का शुभारंभ एक भव्य एवं दिव्य कलश यात्रा के साथ हुआ। इसमें सैकड़ों महिलायें पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर , सिर पर मंगल कलश धारण किये हुये सम्मिलित हुईं। गाजे-बाजे और मंगल गीतों के साथ कलश यात्रा ने कथा क्षेत्र का भ्रमण किया। कथा स्थल पर पहुँचने पर मुख्य यजमान श्रीमति श्वेता देवेन्द्र तिवारी ने श्रीमद्देवीभागवत पुराण की आरती उतारी। तत्पश्चात विद्वान वैदिक आचार्यों द्वारा वेदी पूजन और खटध्यायी महाआरती के साथ प्रथम दिन का अनुष्ठान संपन्न हुआ। कथा आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं से प्रतिदिन दोपहर तीन बजे से पांडाल में पहुंचकर कथा श्रवण करने की अपील की है।

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