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Saturday, April 4, 2026

समाज की सच्चाई से परिचित कराता बाल कहानी संग्रह - प्रियांशी के परेवा

 समाज की सच्चाई से परिचित कराता बाल कहानी संग्रह - प्रियांशी के परेवा 



                - डुमन लाल ध्रुव 

   


    छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में बाल साहित्य की समृद्ध परंपरा अपेक्षाकृत नई होते हुए भी अत्यंत संभावनाशील है। इसी कड़ी में “प्रियांशी के परेवा” बाल कहानी संग्रह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रुप में सामने आता है। यह संग्रह केवल बाल मनोविज्ञान को अभिव्यक्त नहीं करता  छत्तीसगढ़ी भाषा, लोक-संस्कार, ग्रामीण परिवेश और नैतिक मूल्यों को सहज, रोचक और शिक्षाप्रद ढंग से प्रस्तुत करता है।




 लेखक कमलेश प्रसाद शर्मा बाबू ने बाल पात्र “प्रियांशी” के माध्यम से जिज्ञासा, करुणा, चतुराई, संवेदनशीलता और नैतिकता जैसे गुणों को अत्यंत स्वाभाविक ढंग से चित्रित किया है। यह संग्रह न केवल बच्चों के लिए मनोरंजक है अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी प्रेरणादायक है।

   संग्रह में कुल 13 कहानियां संकलित हैं जिनके शीर्षक ही उनकी रोचकता और विविधता का संकेत देते हैं - प्रियांशी के पाठशाला, प्रियांशी के पिकनिक,

चिड़ा अउ मुसुवा, प्रियांशी के पेन (कलम), विकास गुरुजी, प्रियांशी के परेवा, दीनू के सोंच,प्रियांशी के सूझ-बूझ, महतो चोर, वोखर किराया माफ कर दे पापा, प्रोफेशनल भिखारी, ठिठोली परथे भारी, दादा जी के सोनपरी

इन कहानियों में बाल जीवन के विविध रंग उपस्थित हैं विद्यालय, परिवार, मित्रता, प्रकृति, पशु-पक्षी, सामाजिक विसंगतियां और नैतिक दुविधाएं।

 “प्रियांशी के पाठशाला” और “प्रियांशी के पिकनिक” जैसी कहानियां बाल मन की उत्सुकता, आनंद और सीखने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। स्कूल केवल पढ़ाई का स्थान नहीं संस्कार और सामाजिकता का केंद्र है  यह संदेश कहानी के माध्यम से सहज रूप में उभरता है। “प्रियांशी के पेन” में एक साधारण वस्तु  कलम  को केंद्र में रखकर जिम्मेदारी और ईमानदारी का पाठ पढ़ाया गया है। बाल मन छोटी-छोटी चीजों से गहरे अर्थ ग्रहण करता है लेखक ने इस तथ्य को बखूबी समझा है।

     संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा है। छत्तीसगढ़ी की सहज, सरस और बोलचाल की शैली कहानियों को अत्यंत जीवंत बनाती है। संवादों में स्थानीय मुहावरों और कहावतों का प्रयोग पाठक को ग्रामीण परिवेश में ले जाता है।

“चिड़ा अउ मुसुवा” जैसी कथा लोककथात्मक शैली में रची गई प्रतीत होती है। इसमें पशु-पक्षियों के माध्यम से नैतिक शिक्षा दी गई है  जो पंचतंत्र की परंपरा की याद दिलाती है  किंतु स्थानीयता के कारण यह कहानी विशिष्ट बन जाती है।

 “महतो चोर” और “प्रोफेशनल भिखारी” जैसी कहानियां सामाजिक यथार्थ को बाल दृष्टि से प्रस्तुत करती है। लेखक बच्चों को केवल कल्पना लोक में नहीं ले जाते  समाज की सच्चाइयों से भी परिचित कराते हैं।

“वोखर किराया माफ कर दे पापा” में करुणा और सहानुभूति का भाव प्रमुख है। यह कहानी बताती है कि बाल हृदय कितनी सहजता से मानवीय संवेदनाओं को समझ लेता है। “ठिठोली परथे भारी” हास्य के माध्यम से अनुशासन और मर्यादा का पाठ पढ़ाती है।

 “प्रियांशी के परेवा” संग्रह की आत्मा है। परेवा (कबूतर) यहां केवल एक पक्षी नहीं  प्रेम, स्वतंत्रता और करुणा का प्रतीक है। प्रियांशी का परेवा के प्रति स्नेह बाल मन की निष्कलुषता को प्रकट करता है। यह कहानी प्रकृति-प्रेम और जीव-जंतुओं के प्रति दया भाव को विकसित करती है। आज के डिजिटल युग में जहां बच्चे प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं वहां यह कथा उन्हें प्रकृति के निकट ले जाती है।

प्रियांशी एक जीवंत, जिज्ञासु और संवेदनशील बालिका के रूप में उभरती है। वह केवल घटनाओं की दर्शक नहीं  सक्रिय सहभागी है। उसकी सूझ-बूझ, प्रश्न करने की आदत और निर्णय क्षमता उसे एक आदर्श बाल पात्र बनाती है।

“विकास गुरुजी” कहानी में शिक्षक का चरित्र प्रेरक रूप में सामने आता है। गुरु-शिष्य संबंधों की गरिमा और शिक्षा का महत्व प्रभावी ढंग से चित्रित हुआ है। “दादा जी के सोनपरी” में पीढ़ियों के बीच संवाद और स्नेह की अनुभूति होती है।

लेखक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और बाल-सुलभ है। कथानक छोटे-छोटे प्रसंगों में विकसित होता है जिससे बच्चों की रुचि बनी रहती है। संवाद प्रधान शैली कहानी को नाटकीयता प्रदान करती है।

छत्तीसगढ़ी शब्दों की मधुरता कहानी को स्थानीय रंग देती है साथ ही भाषा संरक्षण की दिशा में भी यह संग्रह महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह संग्रह केवल मनोरंजन नहीं  शिक्षा का माध्यम भी है। प्रत्येक कहानी में कोई न कोई नैतिक संदेश अंतर्निहित है ईमानदारी, करुणा, परिश्रम, सहानुभूति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी।

छत्तीसगढ़ी भाषा में बाल साहित्य की उपलब्धता बच्चों को अपनी मातृभाषा से जोड़ने का सशक्त माध्यम है। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा इसका प्रकाशन भाषा संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कुछ कहानियों का कथानक अपेक्षाकृत सरल और पूर्वानुमेय प्रतीत हो सकता है किंतु बाल साहित्य में यही सरलता उसकी शक्ति भी है। लेखक ने उपदेशात्मकता से बचते हुए संदेश को कथा में पिरोया है जो सराहनीय है। कुछ स्थानों पर कथानक का विस्तार और चरित्रों की गहराई और बढ़ाई जा सकती थी परंतु बाल पाठकों की ग्रहणशीलता को ध्यान में रखते हुए वर्तमान रूप उपयुक्त प्रतीत होता है।




          - डुमन लाल ध्रुव 

    मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

        पिन - 493773

 मोबाइल - 9424210208

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