शीर्षक: “परेशानी को प्रोफेशनलिज़्म समझने की भूल”
डॉ. संजय कुमार यादव, सहायक प्रोफेसर (डिजिटल विपणन एवं उपभोक्ता मनोविज्ञान), सर पद्मपत सिंघानिया विश्वविद्यालय
आधुनिक कॉर्पोरेट संस्कृति में “प्रोफेशनल” शब्द का प्रयोग प्रायः दक्षता, समयबद्धता और अनुशासन के संदर्भ में किया जाता है। किन्तु कई बार यही प्रोफेशनलिज़्म एक विकृत रूप ले लेता है, जहाँ प्रबंधक अपनी अनावश्यक सख्ती और जटिल व्यवहार को प्रभावी नेतृत्व समझ बैठते हैं, जबकि वास्तविकता में यह कर्मचारियों के लिए परेशानी और भ्रम का कारण बनता है। इससे न केवल कार्यक्षमता प्रभावित होती है, बल्कि संगठन का वातावरण भी नकारात्मक हो जाता है।
कुछ प्रबंधक यह मान लेते हैं कि कर्मचारियों को निरंतर दबाव में रखना ही उत्पादकता का आधार है। इस सोच के कारण वे अस्पष्ट निर्देश देते हैं, बिना उद्देश्य के बैठकों का आयोजन करते हैं और बार-बार नए नियम बनाकर कार्यस्थल को जटिल बना देते हैं। समय के साथ यह व्यवहार उनकी आदत बन जाता है, जहाँ स्पष्टता के स्थान पर उलझाव और सहयोग के स्थान पर नियंत्रण हावी हो जाता है। कई बार वे एक व्यक्ति के कार्य के लिए अनावश्यक रूप से दो कर्मचारियों को लगा देते हैं, बिना यह समझे कि इससे संगठन को नुकसान होता है।
ऐसे प्रबंधकों की मानसिकता भी चिंताजनक होती है। वे कर्मचारियों को कम आंकते हैं और स्वयं को अधिक सक्षम मानते हैं, जबकि व्यवहारिक नेतृत्व में वे कमजोर होते हैं। वे दूसरों की त्रुटियों को उजागर करते हैं, पर अपनी गलतियों पर मौन साध लेते हैं। उनके लिए कठोरता ही प्रोफेशनलिज़्म का पर्याय बन जाती है।
परिणामस्वरूप, कर्मचारी आलोचना के भय में कार्य करने लगते हैं। संवाद कम होता है, रचनात्मकता घटती है और कार्यस्थल पर मानसिक दबाव बढ़ता है। विडंबना यह है कि प्रबंधक इसे “संलग्नता” समझ लेते हैं, जबकि यह असंतोष और भ्रम का संकेत होता है।
एक प्रभावी नेता वह होता है जो स्पष्ट दिशा प्रदान करे, संवाद को प्रोत्साहित करे और कर्मचारियों को सशक्त बनाए। केवल नियमों और दबाव से संगठन आगे नहीं बढ़ सकता; इसके लिए विश्वास, पारदर्शिता और सकारात्मक कार्य-संस्कृति आवश्यक है।
अंततः, प्रोफेशनलिज़्म का अर्थ केवल कठोरता नहीं, बल्कि संतुलन, संवेदनशीलता और स्पष्टता भी है। इनके अभाव में यह व्यंग्य बनकर रह जाता है—जहाँ कार्य से अधिक परेशानी का प्रबंधन होता है।
लेखक का दृष्टिकोण:
लेखक प्रबंधन विषय का शोधकर्ता है, जिसने भारतीय तेल निगम लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, एनटीपीसी लिमिटेड, टाटा समूह, अडानी समूह, तथा आदित्य बिड़ला समूह इत्यादि जैसे प्रमुख कॉर्पोरेट संगठनों के साथ-साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय, गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा प्राइवेट विश्वविद्यालयों एवं निजी शैक्षणिक संस्थाओं की कार्य-संस्कृति को भी निकट से समझा है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने इस विषय को एक सजग और विचारोत्तेजक रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक का मानना है कि यदि संगठन में सकारात्मक, सहयोगात्मक और सम्मानजनक वातावरण विकसित किया जाए, तो कर्मचारी स्वयं को टीम का अभिन्न हिस्सा समझते हैं और उनकी कार्यक्षमता कई गुना बढ़ जाती है—जहाँ कार्य बोझ नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में अनुभव होता है।


















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