सी एन आई न्यूज रिपोर्टर रमेश श्रीवास्तव पिथौरा 9977708864
लोहराकोट के शासकीय आदर्श महाविद्यालय में व्यवस्था पर गंभीर सवाल: छात्रावास में एक भी बच्चे क्यों नहीं
2021-22 में बने छात्रावास में आज तक नहीं रहा एक भी छात्र, दीवारों में दरारें, कमरों में जाले और फर्श पर गंदगी
महासमुंद/लोहराकोट। विद्यार्थियों को बेहतर उच्च शिक्षा, सुरक्षित आवास और आधुनिक सुविधाएं देने के उद्देश्य से स्थापित शासकीय आदर्श महाविद्यालय महासमुंद (लोहराकोट) इन दिनों व्यवस्थागत अनदेखी की तस्वीर पेश कर रहा है।
महाविद्यालय परिसर में एक तरफ कक्षाएं संचालित हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ विद्यार्थियों के लिए तैयार किए गए छात्रावास खाली पड़े हैं। रखरखाव के अभाव में भवनों की हालत खराब होती जा रही है और महाविद्यालय में स्वीकृत पदों के मुकाबले नियमित शिक्षकों एवं कर्मचारियों की कमी बनी हुई है।
मामला केवल अव्यवस्था का नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों के उपयोग और उनकी निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
छात्रावास तैयार, लेकिन छात्र गायब!
बालक बालिका छात्रावास भवन का निर्माण वर्ष 2021-22 में हुआ था। भवन निर्माण के बाद उम्मीद थी कि दूर-दराज से आने वाले विद्यार्थियों को यहां आवास की सुविधा मिलेगी। लेकिन स्थिति यह है कि निर्माण के वर्षों बाद भी छात्रावास में एक भी छात्र निवासरत नहीं है।
खाली पड़े कमरों की तस्वीरें व्यवस्था की हकीकत बयां करती हैं। कमरों में जाले लगे हैं, फर्श पर गंदगी दिखाई देती है और भवन की दीवारों में दरारें नजर आने लगी हैं।
सवाल यह है कि कुछ ही वर्षों में निर्मित भवन की दीवारों में दरारें कैसे आईं? क्या भवन का नियमित निरीक्षण हुआ? क्या निर्माण के बाद इसकी गुणवत्ता की जांच की गई? और यदि कोई तकनीकी खामी सामने आई तो अब तक उसकी मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?
कर्मचारी नहीं तो छात्रावास कैसे चलेगा?
छात्रावास के संचालन के लिए आवश्यक कर्मचारियों के पद रिक्त बताए जा रहे हैं। कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं होने के कारण छात्रावास का संचालन ही शुरू नहीं हो पा रहा है।
बालिका छात्रावास की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। वह भी खाली पड़ा है। यानी एक ओर छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिए भवन तैयार हैं, दूसरी ओर उनका संचालन करने के लिए आवश्यक मानव संसाधन ही उपलब्ध नहीं है।
यह व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल है—भवन बना देने से छात्रावास नहीं चलता, उसके संचालन के लिए कर्मचारी भी चाहिए।
12 पद स्वीकृत, लेकिन एक भी नियमित सहायक प्राध्यापक नहीं
महाविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था पर नजर डालें तो स्थिति और गंभीर दिखाई देती है।
जानकारी के अनुसार महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के 12 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में एक भी नियमित सहायक प्राध्यापक कार्यरत नहीं है।
शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्वीकृत पदों का लंबे समय तक रिक्त रहना विद्यार्थियों के हित में कितना उचित है, यह सवाल संबंधित विभाग से पूछा जाना चाहिए।
महाविद्यालय में वर्तमान में करीब 11 अतिथि शिक्षक शिक्षण कार्य से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं। यानी नियमित सहायक प्राध्यापकों के स्वीकृत पद होने के बावजूद शिक्षण व्यवस्था में अतिथि शिक्षकों पर निर्भरता बनी हुई है।
महज 5 अशैक्षणिक कर्मचारी संभाल रहे व्यवस्था
शिक्षण व्यवस्था के अलावा महाविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को लेकर भी तस्वीर साफ नहीं है। वर्तमान में केवल 5 अशैक्षणिक कर्मचारी कार्यरत बताए जा रहे हैं।
जब महाविद्यालय संचालित है, छात्र-छात्राओं की संख्या है और संस्थान से जुड़े प्रशासनिक एवं गैर-शैक्षणिक कार्य लगातार होते हैं, तब इतने कम कर्मचारियों के भरोसे व्यवस्था कैसे संचालित हो रही है—यह भी जांच का विषय है।
स्ट्रीट लाइट बंद, परिसर की सुरक्षा पर भी सवाल
महाविद्यालय परिसर में स्ट्रीट लाइट व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं होने की बात सामने आ रही है। कई स्थानों पर रोशनी की व्यवस्था नहीं होने से शाम के बाद परिसर में अंधेरा रहने की स्थिति बनती है।
यदि परिसर में छात्र-छात्राओं की आवाजाही होती है तो प्रकाश व्यवस्था केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा भी है।
खाली भवनों पर खर्च, लेकिन उपयोग कब?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विद्यार्थियों के लिए छात्रावास भवन तैयार हैं, लेकिन उनमें विद्यार्थी नहीं रह रहे, संचालन के लिए कर्मचारी नहीं हैं और भवन रखरखाव के अभाव में खराब हो रहा है, तो आखिर इस पूरी व्यवस्था की निगरानी कौन कर रहा है?
सरकारी भवन का निर्माण होने के बाद उसका उपयोग, रखरखाव और नियमित निरीक्षण भी उतना ही जरूरी है। अन्यथा निर्माण पर किया गया सार्वजनिक व्यय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता।
विभागीय जांच की जरूरत
मामले में अब केवल खानापूर्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदार विभाग द्वारा मौके का निरीक्षण किए जाने की जरूरत है।
विशेष रूप से इन बिंदुओं की जांच जरूरी है—
वर्ष 2021-22 में निर्मित बालक छात्रावास की वर्तमान स्थिति।
भवन की दीवारों में आई दरारों की तकनीकी जांच।
निर्माण की गुणवत्ता और संबंधित एजेंसी की जिम्मेदारी।
निर्माण के बाद भवन का उपयोग क्यों शुरू नहीं हुआ?
छात्रावास के स्वीकृत एवं रिक्त कर्मचारी पदों की स्थिति।
बालक एवं बालिका छात्रावास के संचालन में देरी का कारण।
12 स्वीकृत सहायक प्राध्यापक पदों में एक भी नियमित पदस्थापना क्यों नहीं?
वर्तमान में कार्यरत अतिथि शिक्षकों की वास्तविक संख्या।
केवल 5 अशैक्षणिक कर्मचारियों से महाविद्यालय का संचालन कैसे हो रहा है?
परिसर की बंद स्ट्रीट लाइट व्यवस्था और सुरक्षा की स्थिति।
खाली पड़े भवनों के रखरखाव एवं सफाई पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
सवाल सिर्फ छात्रावास का नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही का है
लोहराकोट का यह मामला अब संबंधित विभाग के लिए गंभीरता से देखने का विषय है। विद्यार्थियों के नाम पर भवन तैयार करना पर्याप्त नहीं है; उन्हें उपयोग में लाना, सुरक्षित रखना और उसके संचालन के लिए पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध कराना भी शासन की जिम्मेदारी है।
यदि 12 सहायक प्राध्यापक पद स्वीकृत हैं तो नियमित नियुक्ति कब होगी? यदि छात्रावास विद्यार्थियों के लिए बनाया गया है तो उसमें विद्यार्थी कब रहेंगे? और यदि भवन में अभी तक किसी छात्र ने कदम ही नहीं रखा, तो उसकी दीवारों में दरारें और कमरों में जाले क्यों दिखाई दे रहे हैं?
अब नजर इस बात पर है कि उच्च शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन इन सवालों का संज्ञान लेकर मौके की जांच कब कराते हैं और वर्षों से खाली पड़े छात्रावास तथा शिक्षकों-कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।



















No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.