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Monday, January 11, 2021

अनियन्त्रित काम , क्रोध , लोभ अभिशाप है --- पुरी शंकराचार्य

 


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज संकेत करते हैं कि अनियन्त्रित काम, क्रोध, लोभ मानव के सभी समस्याओं का जनक होता है। पुरी शंकराचार्य जी दृष्टांत देते हुये कहते हैं कि आतंकवादियों के हृदय की गति भी हम लोग जानते हैं , सत्य का पक्ष लेना जीव का और उसकी बुद्धि का धर्म है। अव्वल दर्जे का आतंकवादी चोर लुटेरा भी क्या करता है ? वह भी सत्य का पक्ष लेता है। उसकी बुद्धि हमेशा सत्य का पक्ष लेती है , इसकी बहुत बढ़िया उदाहरण है। आप भोजन करने बैठे , सामने आपके कुत्ता आँख से रोटी मांँगने का अभिनय करने लगा , किलकारी मारने लगा , पूंँछ हिलाने लगा। आप ने इतना सा रोटी का टुकड़ा दे दिया। आपको मालूम है इससे पेट भरेगा नहीं , पेट की निवृत्ति नहीं होगी , उसे भी मालूम है। बड़े चाव से रोटी का टुकड़ा पाकर कृतज्ञता व्यक्त करेगा। अपने शब्दों में पूंँछ हिलावेगा और बहुत ही विनम्रतापूर्वक आपकी ओर आँख से देखेगा। इसलिए जो धनाढ्य होते हैं दूसरों को लूट - लूट कर उनका मन स्वयं उनको कोसता है। अपनी दृष्टि में वो गिरे हुये होते हैं। और जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं , हमारे बुद्धि की बलिहारी हैं कि हम दूसरों के प्रति व्यवहार करें। एक नंबर का हिंसक भी दुसरों से अपने प्रति अहिंसा की भावना रखता है। मेरी या मेरे बहु-बेटे को कोई हत्या ना कर दे। एक नंबर का झूठ बोलने वाला भी दूसरों से सत्य भाषण की अपेक्षा रखता है। कोई झूठ बोलकर के मुझे चकमे में डाल ना दे। एक नंबर का चोर जिसका नाम आपने लिया , वर्णन किया दूसरों से अचोरी की भावना रखता है। कोई चुराई हुई संपत्ति को या धरोहर को कोई चुरा के ना ले जाये। एक नंबर का व्यभिचारी भी दूसरों से व्यभिचार की भावना नहीं रखता , हमारी बहु-बेटी हमारे शील का अपहरण ना कर दे। एक नंबर का लुटेरा भी यही भावना रखता है कि हमारी लूटी हुई सामग्री को कोई लूट ना ले जाये। इसलिये भगवान श्रीकृष्ण का गीता के छठे अध्याय में वचन है , जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं वैसा व्यवहार हम काम, क्रोध, लोभ अनियंत्रित होने के कारण दूसरों के प्रति कर नही पाते। गीता के सोलहवें अध्याय का, भागवत के एकादश स्कंध का अध्ययन कीजिये। नर्क के द्वार तीन हैं, अनियंत्रित काम, अनियंत्रित क्रोध, अनियंत्रित लोभ। आपको संभवतः मालूम ना होगा रिटायर होने के बाद आईएएस अफसर ज्यादातर जेल में हैं। पद का दुरूपयोग करके खूब धनाढ्य तो हो गये , अब वो जेल में हैं। इसलिये हमने संकेत किया अपनी दृष्टि में वो गिरे होते हैं। अनियंत्रित काम, क्रोध, लोभ मानवता के लिये अभिशाप है। ऐसी स्थिति में थोड़े समय तक बाहर से वो सुखी दिखायी देते हैं , अंदर से बिल्कुल खोखला होते हैं। क्योंकि अनियंत्रित काम व्यक्ति को स्वयं जलाता है , अनियंत्रित क्रोध भी जलाता है ,अनियंत्रित लोभ भी जलाता है , वो सुख और शांति नहीं प्राप्त करते। जिनको हम समझते हैं कि बड़े सुखी हैं, उनसे पूछिये वो सुख-शांति प्राप्त नहीं करते। लेकिन गरीबी का जीवन व्यतीत करके भी जिसके धन में किसी की हाय नहीं है वो रोटी नमक से पायेगा तो भी उसको संतोष रहेगा।

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