अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
बिलासपुर - अपने अहंकार का शमन करके पूर्ण पुरूषार्थ के बाद पूर्ण समर्पण हो जाना ही जीवन की सार्थकता है। मनुष्य जब ध्यान में जाता है तो प्रकाश ढूंढने का प्रयास करता है, लेकिन प्रकाश मिल जाने के बाद कुछ ढूंढ़ना शेष नही रह जाता। उसी प्रकार जब मनुष्य का जन , धन , शरीर , बल , बुद्धि , पद व पुरुषार्थ भी काम करना बन्द कर दे और कोई रास्ता दिखाई ना दे , तब उसे स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना चाहिये। गजेंद्र ने ग्राह से एक हजार वर्ष तक युद्ध करके अपने आप को छुड़ाने का पूर्ण प्रयत्न किया किन्तु पूर्ण प्रयास के बाद भी असफल होने पर गजेंद्र ने सर्वान्तर्यामी श्री नारायण में आत्मसमर्पण कर दिया जिससे भगवान प्रकट होकर उसका उद्धार कर दिये।
उक्त बातें रूद्र विहार-अशोक नगर बिलासपुर में श्रीमति मधु गौरहा की स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पुरी शंकराचार्य के कृपापात्र शिष्य आचार्य श्री पद्मेश शर्मा (चाम्पा निवासी) ने श्रोताओं को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाते हुये कही। आचार्य श्री ने श्रोताओं को सारगर्भित कथा में बताया कि क्षीरसागर में दस हजार योजन ऊँचा त्रिकुट नामक पर्वत पर हाथियों का राजा गजेन्द्र सपरिवार निवास करता था। एक दिन वह उसी पर्वत पर अपने परिवारजनों के साथ झाड़ियों और पेड़ों को रौंदता हुआ घूम रहा था। उसके पीछे-पीछे हाथियों के छोटे-छोटे बच्चे तथा हथिनियाँ घूम रही थी। धूप के कारण उसे तथा उसके साथियों को प्यास लगी। तब वह अपने समूह के साथ पास के सरोवर से पाने पी कर अपनी प्यास बुझाने लगा। प्यास बुझाने के बाद वे सभी साथियों के साथ जल- स्नान कर जल- क्रीड़ा करने लगे। उसी समय एक बलवान मगरमच्छ उस गजराज के पैर को मुँह मे दबोच कर पानी के अंदर खीचने लगा। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगा कर स्वयं को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन असफल रहा। उसके झुण्ड के साथियों ने भी उसे बचाना चाहा पर कोई भी सफल ना हो सके। जब गजेंद्र ने अपने आप को मृत्यु के निकट पाया और कोई उपाय शेष नहीं रह गया। किन्तु पूर्व जन्म की निरंतर भगवद आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आयी। उसने निश्चय किया कि मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूं। इस निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा। गजेन्द्र की स्तुति सुन , उन्हें पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से उक्त सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने हाथ में चक्र लिये गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तीव्रता से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुन्दर पुष्प अपनी सूंड में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा- नारायण ! जगद्गुरो ! भगवान ! आपको नमस्कार है। गजेन्द्र को अत्यंत पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।ब्रह्मादि देवगण श्री हरि की प्रशंसा करते हुये उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे , सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म भगवान विष्णु का गुणगान करने लगे। ग्राह दिव्य शरीर-धारी हो गया , उसने विष्णु के चरणो में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान विष्णु के गुणों की प्रशंसा करने लगा। भगवान विष्णु के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पाप मुक्त होकर अभिशप्त हूहू गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रेलोक्य वन्दित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया। भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गन्धर्व,सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे। गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा- प्यारे गजेन्द्र ! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूँगा। यह कहकर भगवान विष्णु ने पार्षद रूप में गजेन्द्र को साथ लिया और गरुडारुड़ होकर अपने दिव्य धाम को चले गये। आचार्य श्री ने बताया कि हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्योदय के पूर्व उठकर स्नान , ध्यान करके नियमित रूप से गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ करने से जीवन के हर प्रकार के कर्ज से मुक्ति मिल जाती है।
ग्राह और गजेन्द्र के पूर्व जन्म की कथा
ग्राह के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हुये आचार्य श्री ने बताया कि गजेंद्र को जिस ग्राह ने पकड़ा था वह पूर्व जन्म में ‘हूहू’ नाम का श्रेष्ठ गन्धर्व था। एक बार देवल ऋषि जलाशय में स्नान कर रहे थे। उसी जलाशय यह हूहू नामक गंधर्व ने चुपचाप अंदर जाकर ऋषि के पैर पकड़ लिये और मगर मगर (मगरमच्छ) कहकर चिल्लाने लगा। इससे क्रोधित होकर देवल ऋषि ने हूहू को श्राप देते हुये कहा – तुझे संत-महात्मा का आदर करना चाहिये और तू मजाक उड़ा रहा है। और मगर की तरह आकर मेरा पैर पकड़ता है। अरे दुष्ट! अगर तुझे मगर बनने का इतना ही शोक है तो तुझे मगर की योनि प्राप्त होगी। शाप मिलते हीं वह गंधर्व ऋषि से क्षमायाचना करने लगा। तब ऋषि ने कहा – तू मगर की योनी में जरूर जन्म लेगा लेकिन तेरा उद्धार भग्वान के हाथों होगा। इसी ग्राह रूपी हूहू गंधर्व का उद्धार भगवान श्री हरि ने किया। इसी तरह गजेन्द्र के पूर्व जन्म की कथा बताते हुये आचार्य श्री ने कहा कि पूर्व जन्म में गजेंद्र का नाम इन्द्रद्युम्न था। वह द्रविड़ देश का पाण्ड्वंशी राजा था । वह भगवान का बहुत बड़ा सेवक था। उसने अपना राजपाट छोड़कर मलय पर्वत पर रहते हुये जटायें बढ़ाकर तपस्वी के वेष में भगवान की आराधना में लीन था। एक दिन वहाँ से अगस्त्य मुनि अपने शिष्यों के साथ गुजरे और उन्होंने राजा को एकाग्रचित होकर उपासना करते हुये देखा। अगस्त्य मुनि ने देखा कि यह राजा अपने प्रजापालन और गृहस्थोचित अतिथि सेवा आदि धर्म को छोड़कर तपस्वी की तरह रह रहा है। अत: वह राजा इन्द्रद्युम्न पर क्रोधित हो गये। और क्रोध में आकर उन्होंने राजा को शाप दिया – कि हे राजन् तुमने गुरुजनों से बिना शिक्षा ग्रहण किये हुये अभिमानवश परोपकार से निवृत्त होकर मनमानी कर रहे हो अर्थात् हाथी के समान जड़ बुद्धि हो गये इसलिये तुम्हें वही अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो’।राजा ने इस श्राप को अपना प्रारब्ध समझा। इसके बाद दूसरे जन्म में उसे आत्मा की विस्मृति करा देने वाली हाथी की योनि प्राप्त हुई। परन्तु भगवान की आराधना के प्रभाव से हाथी होने पर भी उन्हें भगवान की स्मृति हो ही गयी। भगवान श्रीहरि ने इस प्रकार गजेन्द्र का उद्धार करके उसे अपने लोक में स्थान दिया। चतुर्थ दिवस की कथा में महाराजश्री ने गजेन्द्र मोक्ष के अलावा समुद्र मंथन , कच्छपावतार- धन्वन्तरी अवतार- मोहिनी अवतार- वामन अवतार- श्रीराम जन्म-श्री कृष्णजन्म कथा सुनायी और श्रद्धालुओं ने भगवान का प्राकट्योत्सव भी बड़े धूमधाम से मनाया।


















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