अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जांजगीर चांपा - छत्तीसगढ़ी भाषा एवं धार्मिक ग्रंथों को देश-दुनियां में ख्याति दिलाने के उद्देश्य से कोसा , कांसा एवं कंचन की नगरी एवं मां समलेश्वरी की पावन धरा चाम्पा निवासी रविन्द्र कुमार सोनी ने गीता जैसे कालजयी ग्रंथ का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद करके अद्भुत मिसाल पेश किया है। वे विगत तीन दशक पहले समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं के लिये आलेख लिखा करते थे। साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने बताया कि साहित्यिक-सांस्कृतिक साधना करते हुये सोनार पारा, चांपा में "कन्हैया ज्वेलर्स" नाम से सोने-चांदी के कलात्मक छत्तीसगढ़ी आभूषणों का निर्माण और अंचल में व्रिक्रय भी करते हैं। बचपन से ही इनके अंदर राष्ट्रीयता अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भावना कूट-कूट कर भरी हैं , जिसके फलस्वरूप ही राष्ट्रवादी विचारधारा से ओत-प्रोत साहित्य लेखन करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि गीता एक कालजयी ग्रंथ हैं। गीता के दो अक्षरों में समाये अर्थ और इस अर्थ में निहित मंत्र रविन्द्र कुमार को भी दीर्घकाल से प्रभावित करता रहा हैं। गीता के कर्म , ज्ञान और भक्ति की पुण्य पावन त्रिवेणी में डुबकी लगाने के उद्देश्य से ही रविन्द्र ने श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान भाषा में अनुवाद किया हैं। वहीं पांच भाईयों एवं तीन बहनों में तीसरे नंबर के रविन्द्र सोनी पिता स्व० कन्हैयालाल सोनी ने चर्चा के दौरान अरविन्द तिवारी को बताया कि उन्होंने राजनीति में एम०ए० किया है। एक समय जब आरएसएस की बैठक में रायपुर गये थे तो किसी ने पूछा कि छत्तीसगढ़ी भाषा में कोई ग्रंथ है क्या ? किसी के द्वारा सकारात्मक जवाब नही मिलने पर ही उन्होंने लक्ष्य बनाया कि अब उनको छत्तीसगढ़ी भाषा में ही किताब लिखना है। रविन्द्र सोनी बताते हैं कि उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता को छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखने के लिये दस वर्ष लग गये। हालांकि इस बीच उन्होंने इस्कॉन भक्ति वेदान्त ट्रस्ट के लिये भी छोटे मोटे और कई पुस्तकों का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद किया। इसके अलावा उनके द्वारा बड़े किताबों में वर्ष 2006 में लिखा गया "भागवत के अंजोर" मुख्य है। अपने गीता ग्रंथ के बारे में जानकारी देते हुये रविन्द्र ने बताया कि लगभग 5000 वर्ष पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन के माध्यम से कुरूक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण ने अपने मुख से कहा और वेदव्यास ने उन्हें लिखा। गीता आज भी प्रासंगिक हैं ,जो हमें जीवन जीने की कला सिखाती हैं। गीता अनमोल ग्रंथ है इसमें भाव परिवर्तन नहीं होना चाहिये। हमारे सभी धार्मिक ग्रंथों को छत्तीसगढ़ी भाषा में बढ़ावा मिलना चाहिये। रविन्द्र सोनी के इस प्रतिभा पर नगरवासियों , जनप्रतिनिधियों सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि साहित्यिक-सांस्कृतिक साधना करते हुये रविन्द्र की प्रतिभा और उनका छत्तीसगढ़ी मातृभाषा के प्रति लगाव ही है कि उन्होंने धार्मिक ग्रंथ गीता के उपदेश का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद किया हैं। वे विभिन्न धार्मिक स्थानों की यात्रा करने के बाद यात्रा संस्मरण लिखकर संग्रहित करते हैं। छत्तीसगढ़ी परिवेश में पले-बढ़े रविन्द्र बधाई एवं अभिनंदन के पात्र हैं। गीता जीवन के यथार्थ का साक्षात्कार करवाकर लोगों को जीने की कला सिखाती हैं। ऐसे में मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में उपदेशों का अनुवाद स्तुत्य हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों के लिये अमूल्य वरदान है कि उन्हें श्रीमदभागवत गीता मातृभाषा में पढ़ने को मिल रहा हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं जीवन में उतार-चढ़ाव, सुख-दुख और लाभ-हानि आते रहते हैं गीता शांति भाव रखते हुये धैर्यवान बनाये रखने का प्रयास करती है। मातृभाषा में अनुवाद करके रविन्द्र ने समाज का नाम रौशन किया हैं , समाज में ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिये।


















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