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Sunday, April 11, 2021

नागरमोथा की खेती से गुलजार होगा नवागढ़ की धरती--किशोर राजपूत, लघु प्रयोग रहा सफल



देव यादव सी एन आई न्यूज़ बेमेतरा छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य आदि काल से ही महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों व अन्य उपयोगी वनस्पतियों के भण्डार के रूप में विख्यात है। इस क्षेत्र में पाये जाने वाले पहाड़ों की श्रृंखलायें, जलवायु विविधता एवं सूक्ष्म वातावरणीय परिस्थितियों के कारण प्राचीन काल से ही अति महत्वपूर्ण वनौषधियों की सुसम्पन्न सवंधिनी के रूप में जानी जाती हैं। प्राचीन काल से ही वनस्पतियों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार हेतु किया जाता है। इसका प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद (3500 ई. पूर्व) में मिलता है। देश में उपलब्ध वनस्पति प्रजातियों में से लगभग 1000 किस्म के पौधे अपने विशेष औषधीय गुणों के कारण विभिन्न-विभिन्न औषधियों में प्रयुक्त होते हैं, और इनसे लगभग 8000 प्रकार के मिश्रित योग (कम्पाउण्ड फारमुलेन्सस) बनाये जाते हैं देश में वनों के विनाश के कारण लुप्त होती औषधीय नागरमोथा पौधों की प्राप्ति का एकमात्र साधन अब इसकी खेती ही रह गई है। देशी चिकित्सा पद्धतियों के बढ़ते प्रभाव और आयुर्वेदिक, यूनानी एवं एलोपैथिक के साथ ही होम्योपैथिक चिकित्सा में लगातार बढ़ते प्रयोग और विदेशों में किए जा रहे हैं शोधकार्य तथा नई पेटेंट नीति के कारण विदेशी मूल की दवाओं की कीमत में बेतहाशा बढ़ोतरी ने भारतीय उद्योग की मांग को देश ही नहीं विदेशों में भी काफी बढ़ाया हैं।


नागरमोथा साइप्रेसी कुल का पादप है। इसका वानस्पतिक नाम साइप्रस स्केरियोसस है। इसे संस्कृत में मुस्तिका के नाम से संबोधित किया गया है। नागरमोथा की साठ प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसमें व्यवसायिक दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी साइप्रस स्केरियोसस ही है। इसकी जड़ों से प्राप्त तेल का प्रयोग सुगंधियों और औषधियों में किया जाता है। इसकी मांग दवा बनाने वाली देशी, विदेशी कंपनियों के अलावा सुगंध के लिए साबुन, शैंपू, परफ्यूम और अगरबत्ती की कंपनियों की ओर से लगातार बढ़ रही है। नागरमोथा की जड़ों से प्राप्त होने वाले औषधीय तेल को साइप्रस ऑयल या साईप्राल कहा जाता है। वनौषधियों की बढ़ती हुई इस मांग ने इनकी खेती को अत्यंत लाभप्रद बना दिया है। इसकी खेती से किसानों को परंपरागत अनाज और सब्जी की तुलना में अधिक मूल्य भी मिल रहा है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वनौषधियों की खेती आज भारतीय कृषकों के लिए रोजगार का नया साधन बनती जा रही है। नागरमोथा की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी खेती का जो तरीका इजाद किया है, उसके अंतर्गत इस पौधे की खेती के लिए इसकी जड़ सहित निचले तने के अंकुरण एवं योग्य शाखाओं का उपयोग किया जाता है। इसका प्रसार लमेनग्रास या खस के पौधे की ही तरह तना सहित जड़ वाले हिस्से को रोपकर किया जाता है।इसकी खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रेतीली, दोमट और दलदली जमीन होती है। मूल रूप से इसकी खेती के लिए जलधारक क्षमता वाली भूमि उपयुक्त होती है। ऐसी भूमि में इसकी जड़ों का विकास अच्छा होता है। इसकी खेती बंजर और बंजर जमीन में भी सफलतापूर्वक होती है।

 इसकी खेती के लिए अप्रैल या मई के महीने में खेत की जुताई करके उसमें उगी घास को अच्छी तरह से निकालकर खेत को धूप लगाने के लिए छोड़ देना चाहिए। जब खेत को अच्छी तरह धूप लग जाए और मिट्टी में भरपूर भूरापन दिखाई देने लगे, तब इस खेत में 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद मिलाकर एक हल्की जुताई करके खाद को खेत में मिला देना चाहिए। खेतों में 15 जून से 15 जुलाई के बीच इसके जड़ सहित निचले तने को जड़ के ऊपर से 3.4 इंच छोड़कर काटने के बाद अंकुरण योग्य एक एक पंजे को अलग करके 15-15 सेमी की दूरी पर तैयार खेत में रोप देना चाहिए। इसके लिए एक हेक्टेयर खेत में 20000 पुंजे वाले पौधों की रोपाई की जाती है। पौधों की रोपाई के तुरंत बाद खेत की हल्की सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। रोपाई के दो सप्ताह बाद खेत की जरूरत को देखकर पहली सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। इसकी खेती के लिए इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि यह नम क्षेत्र में पैदा होने वाली वनस्पति है। अतः इसकी खेती के लिए भूमि में हमेशा नमी बनी रहना आवश्यक है, अन्यथा इसकी खेती लाभकारी नहीं रहेगी। अतः इसकी सिंचाई नियमित रूप से 10 से 15 दिन के अंतराल पर अवश्य करते रहना चाहिए। यदि खेत में खरपतवार दिखे, तो समय-समय पर इस की निराई भी अवश्य करनी चाहिए, जिससे फसल की बढ़वार जारी रहे। अगस्त माह के अंत में या सितंबर के शुरू में खुरपी या कुदाली से फसल की गुड़ाई करनी चाहिए। गुड़ाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रोपी गई फसल पौधे के अगल- बगल की मिट्टी पलट कर भूमि में हवा, धूप आदि का प्रवेश हो सके और पौधे के अगल-बगल की मिट्टी मुलायम हो जाए।

खेतों में उगाई गई नागरमोथा की फसल 18 माह में तेल निकालने के योग्य हो जाती है। अतः व्यवसायिक रूप से इसकी जड़ों की खुदाई के लिए दिसंबर और जनवरी माह का समय सबसे उपयुक्त होता है, क्योंकि इस समय इसकी पत्तियां पीली पढ़कर पकने लगती हैं, जो इसके तैयार होने की आसान पहचान है। इसकी जड़ों को खोदकर अच्छी तरह मिट्टी साफ करके हल्की धूप में सुखा लेना चाहिए। बाजार में नागरमोथा की तैयार जड़ की कीमत न्यूनतम 35से अधिकतम 80 रूपये प्रति किलो रहती है। एक खरपतवार से मादक सुगंध तलाशने में करीब 40 वर्ष का वक्त लग गया, लेकिन जब सफलता मिली तो ऐसी कि आज पूरे विश्व में उसकी मांग है।आयुर्वेद में इस वायरस का इलाज संभव है। वनौषधियों से इस खतरनाक वायरस का इलाज किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने पांच तरह की जड़ी बूटी बताई। ये जड़ी बूटियां नागर मोथा, किसी भी प्रकार के संक्रमण को आसानी से दबाता है. छत्तीसगढ़ प्रदेश में अब तो हजारों किसानों का तेजी से औषधीय खेती-बाड़ी में लगातार रुझान बढ़ता जा रहा है। वे व्यापक स्तर पर औषधीय पौधों और सुगंधित पौधों की खेती कर रहे हैं।

  *खेती में किया सफल प्रयोग*

किशोर राजपूत ने 1 हजार पौधे अपने खेत के एक किनारे पर लगा कर परीक्षण किया जो परिणाम मिला वो काफी फायदेमंद साबित हुआ और अब एक एकड़ जमीन पर इसकी खेती करने की तैयारी है।

*नागर मोथा के औषधीय गुण धर्म*

नागरमोथा में प्रोटीन, स्टार्च के अलावा कई कार्बोहाड्रेट पाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इसके पौधे का लेप लगाने से शरीर की सूजन खत्म हो जाती है। इसके अलावा कई प्रकार की गंभीर बीमारियों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें एंटी वैक्टीरियल गुण भी होते हैं।


सी एन आई न्यूज़ बेमेतरा छत्तीसगढ़ देव यादव की खबर मो 9098647395

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