Breaking

अपनी भाषा चुने

POPUP ADD

सी एन आई न्यूज़

सी एन आई न्यूज़ रिपोर्टर/ जिला ब्यूरो/ संवाददाता नियुक्ति कर रहा है - छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेशओडिशा, झारखण्ड, बिहार, महाराष्ट्राबंगाल, पंजाब, गुजरात, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटका, हिमाचल प्रदेश, वेस्ट बंगाल, एन सी आर दिल्ली, कोलकत्ता, राजस्थान, केरला, तमिलनाडु - इन राज्यों में - क्या आप सी एन आई न्यूज़ के साथ जुड़के कार्य करना चाहते होसी एन आई न्यूज़ (सेंट्रल न्यूज़ इंडिया) से जुड़ने के लिए हमसे संपर्क करे : हितेश मानिकपुरी - मो. नं. : 9516754504 ◘ मोहम्मद अज़हर हनफ़ी - मो. नं. : 7869203309 ◘ सोना दीवान - मो. नं. : 9827138395 ◘ आशुतोष विश्वकर्मा - मो. नं. : 8839215630 ◘ सोना दीवान - मो. नं. : 9827138395 ◘ शिकायत के लिए क्लिक करें - Click here ◘ फेसबुक  : cninews ◘ रजिस्ट्रेशन नं. : • Reg. No.: EN-ANMA/CG391732EC • Reg. No.: CG14D0018162 

Sunday, April 11, 2021

खेती के विनाश के षड्यंत्र में जुटे विदेशी खाद कम्पनिया :-किशोर राजपूत



देव यादव सी एन आई न्यूज़ बेमेतरा

बेमेतरा नवागढ़ कभी भारत सोने की चिड़ियाँ हुआ करता था, गौ वंश देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हुआ करती थी। लेकिन आज हमारी स्थिति इतनी खराब है जिसका एक बड़ा कारण है कि हमारे देश का करोडों रुपया हर वर्ष विदेशों मे जा रहा है और उसके बदले में हमे मिल रहा है बंजर धरती का इनाम और अथाह बेरोजगारी। आज हम जानेंगे कौन है इसका जिम्मेदार और हम कैसे भारत को दोबारा से विश्व गुरु बना सकते हैं।


*भारत के विनाश की रणनीति*


विदेशी ताकतों ने अनुसंधान करके पता लगाया की भारतीय किसान अपने खेतों में जिस गाय के गोबर की खाद का प्रयोग करता है उससे यंहा की धरती की उपजाऊ शक्ति कभी कमजोर नहीं होती तथा गोबर की खाद से जो अन्न व खाद्य पदार्थ पैदा होता है। वह बहुत पोष्टिक एवं ताकतवर होता है । इसलिए यंहा के लोगों मे विशेष ऊर्जा होती है। यही वो बात है जो यंहा के जवानों को नौजवान बनाती है।



इस बात को ध्यान रख कर विदेशी ताकतों ने विचार किया की क्यों न यंहा की आबादी को, यंहा के जवानों को, यंहा की जमीन की उपजाऊ शक्ति को समाप्त करने के लिए ऐसी रणनीति बनाई जाए कि न रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी। अर्थात हमारी धरती को बंजर बनाने के लिए रसायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों का निर्यात किया जाए। इस षड्यंत्र कि आड़ मे उन्होने दोहरा लाभ उठाया। एक तो उनकी खाद का आयात करने के बदले हमारे देश का धन विदेशों मे चला गया दूसरा जो उनका सबसे महतावपूर्ण उद्देशय हमारी जमीन और जवान को बर्बाद करने का था उसमे वो सफल होने लगे, क्योंकि जब जवानों मे ताकत ही नही रहेगी तो वो लड़ेंगे कैसे।


*बंजर जमीन एवं धन निष्कासन*


अपनी इस नीति को कारगर बनाने के लिए उन्होने हमारे राजनेताओं को धन का लालच देकर अपनी रसायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं हमारे देश में निर्यात करना शुरू कर दिया। यह देशवाशियों के लिए सोचने का विषय है कि एक तरफ हमारे कुछ नेता देश का धन चूसने में लगे हुए हैं और दूसरी तरफ खाद के आयात से हमारे देश का धन अपनी जमीन को बंजर बनाते हुए विदेशों मे जा रहा है।



यंहा इस बात का उल्लेख करना ज्यादा आवश्यक हो जाता है कि जो रसायनिक खाद एवं कीटनाशक विदेशों से हमारे देश में आयात किया जाता है उसे वो देश अपने देश मे इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वो इसका प्रयोग करके इसके दुष्परिणाम देख चुके हैं कि इससे धरती बंजर हो जाती है और रसायनिक खाद से पैदा किए गए अन्न, फसल एवं खाद्य पदार्थों का सेवन करने से मनुष्य को कैंसर, ट्यूमर जैसी प्राणघातक बीमारियाँ होती हैं।


*गाय भारत के गौरवमयी अतीत का आधार*


अतीत मे विदेशियों रिसर्च में पाया कि प्रत्येक भारतीय व्यक्ति चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कितनी भी खराब क्यों न हो लेकिन उसके खूँटे पे कम से कम एक देशी गाय अवशय बंधी पायी गयी जिसके पौष्टिक एवं स्वस्थयवर्धक दूध, घी, दही और छाछ का सेवन करने से ही भारतीय जवान इतने हष्ट-पुष्ट और ताकतवर हैं तथा इन्ही गायों के बछड़े और बैल खेती, काश्तकारी में हल जोतने,रहट तथा गुड़ और तेल के कोल्हू चलाने के साथ-साथ बैलगाड़ी से बोझा ढोने इत्यादि सभी कार्यों मे देशी गौवंश ही रीढ़ कि हड्डी है।


*भारत के गौरव को समाप्त करने का षड्यंत्र*


इसलिए विदेशियों ने भारतीय गौवंश की उपयोगिता को समाप्त करने के लिए बाज़ार में सिंथेटिक दूध के प्रयोग को बढ़ावा दिया। खेती किसानी के काम में ट्रक्टर और मशीनीकरण को बढ़ावा देकर बैलों कि उपयोगिता को समाप्त करने का षड्यंत्र किया गया। हमारे पूजनीय गौवंश को कत्ल करने के लिए उसके मांस और चमड़े की विश्व मे सबसे अधिक कीमत लगाई गयी।



इस घृणित पाप का विदेशों मे निर्यात करने के लिए भी हमारे नेताओं को विदेशी मुद्रा भंडार के रूप मे धन कमाने का लालच दिया गया । इस प्रकार हिंदुस्तान की मैनपावर हमारी पूज्य गऊमाता , धरतीमाता और हमारे देश के जवानों को खोखला करने की जो पॉलिसी विदेशियों ने बनाई थी उसमे आज वे सफल होते दिखाई दे रहे हैं। मांस व चमड़े का विदेशों मे निर्यात करने के कारण प्रतिदिन लाखों की संख्या मे गाय बैलों का बेदर्दी से बूचड़खानों में कत्ल हो रहा है ।



 

*विकास की हक़ीक़त*

समाज मे आए बदलाव को देखकर आज यह दावे किए जा रहे हैं कि हमारा देश बहुत तरक्की कर रहा है लेकिन सत्यता यह है कि देश अंदर से दीमक की तरह खोखला हो चुका है। हमारी संस्कृति और मान्यताएं कमजोर पड़ती जा रही हैं । भारतीयता को त्यागकर पाश्चात्य संस्कृति की नकल करने मे हम अंधे हो चुके हैं । यह सब विदेशी सभ्यता एवं खानपान की नकल का परिणाम है। बे मौसमी फल एवं सब्जियाँ पैदा की जा रही हैं। जिसने हमारे खान पान को बिगाड़ दिया है इस प्रकार के खाद्य पदार्थ लेने से हमारा शारीरिक एवं बौद्धिक विकास रुक जाता है।


*भारत मे स्वास्थय की स्थिति*


हम नयी-नयी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। आप सोच सकते हैं कि क्या कारण है जो हमारे दादा कि पीढ़ी के लोग 100 साल तक जीते थे लेकिन आज की पीढ़ी कि औसत आयु 60 साल तक रह गयी है। क्या यही विकास है? आपको नहीं लगता कि इतनी मेडिकल सेवाएँ होने के बावजूद लोग बीमार हो रहें है। आज ऐसा एक भी परिवार नहीं है जिसमे कोई मरीज न हो। क्या आप किसी परिवार को जानते हो जिसने पिछले एक महीने से दवाई न ली हो?


*इस विकट समस्या का निदान*


जो बीमारियाँ विदेशों मे सुनते थे वो आज शहरों की तो बात छोड़िए, गाँव तक पन्हुच चुकी है। जबकि अकेले गौमूत्र से ही बहुत सी बीमारीयां ठीक हो सकती हैं। गाय के स्पर्श मात्र से ही कितने सारे रोग ठीक हो जाते हैं । लेकिन हमने अपनी गऊमाता को विदेशियों के चाल मे फंसकर कुरड़ियों पर पोलिथीन खाने पर मजबूर कर दिया है। विज्ञान कभी भी गौमता कि तरह घास से दूध नहीं बना सकता। जबकि गऊमाता घास खा कर हमें पौष्टिक दूध, माखन दही और गौमूत्र के रूप में औषधियां देती है। इसीलिए हमारे पुराने ग्रन्थों में गऊ को माता का दर्जा दिया गया है।

सरकार की ज़िम्मेदारी 

यदि हमारी सरकार द्वारा गऊमाता के विकास का कार्य किया गया होता तो आज किसान कि ये दशा नही होती। यदि गौमूत्र का सही उपयोग किया जाता उसके गुणों के विषय मे शोध किया जाता, उसके उपयोग के लिए नयी तकनीक विकसित की जाती तो आज हमारे किसान और खेती की स्थिति बहुत भिन्न होती। क्योंकि किसान जो खेती के साथ साथ गौपालक भी है, उन्हे खेती करने में कोई लागत ही नहीं लगानी पड़ती, लागत न होने के कारण अनाज और अन्य उत्पाद महेंगे नहीं होते। सरकार को भी किसी प्रकार की आर्थिक सहायता किसान को खाद या बीज के रूप मे नहीं देनी पड़ती। जनता पर टेक्स का बोझ नहीं पड़ता, जिसके परिणामस्वरूप गरीबी और महंगाई दोनों ही नियंत्रण मे रहती और असली विकास के साथ साथ देश में समृद्धि भी बढ़ती।



*जीवामृत पौधों की वृद्धि के लिए सही खेती*


देसी गाय के गोबर की उपयोगिता 

जैसे की देशी गाय के पैंतीस ग्राम गोबर से एक एकड़ भूमि को उपजाऊ बनाने की विधि है, जिसे कुछ समय पहले न्यूज़ीलैंड के कृषि तथा पशु वैज्ञानिक पीटर प्रॉक्टर ने भी अपने भारत प्रवास में प्रयोग से सिद्ध किया। और हमारे ऋषि-मुनि सदियों पहले ही इस विधि का प्रयोग करके अपने आश्रम में उच्च गुणवत्ता का अनाज एवं फल उत्पादन किया करते थे। इसे अतीत में ऋषि कृषि के नाम से जाना जाता था। जिसे आज कल कई वैज्ञानिक एवं कृषि विशेषज्ञ प्राकृतिक कृषि या ज़ीरो बजट खेती भी कहते हैं। हमारे किसान भाई बहन भी इस विधि का प्रयोग करके अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं वो भी बिना किसी लागत के।




*अंतिम निष्कर्ष*


यदि हम अपनी देशी गऊमाता के दूध, गोबर एवं गौमूत्र की उपयोगिता को समझ लें तो हमारे देश से बीमारी, गरीबी और बेरोजगारी काफी हद तक अपने आप समाप्त हो जाएगी। अत: हमें अपनी देशी गऊमाता की रक्षा करते हुए अपनी भारतीय परंपरा, संस्कृति और सभ्यता को अपनाना चाहिए। जिससे हम अपने देश को दुनिया मे वही स्थान दिला पायें जो हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया था।


सी एन आई न्यूज़ बेमेतरा छत्तीसगढ़ देव यादव की खबर मो 9098647395

No comments:

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Hz Add

Post Top Ad