ब्यूरो मीनू साहू
सी एन आई न्यूज़
बालोद:-आत्मवेत्ता गुरु के संग के प्रभाव से आपका जीवन संग्राम सरल बन जायेगा। गुरु का आश्रय लो और सत्य का अनुसरण करो। अपने गुरु की कृपा में श्रद्धा रखो और अपने कर्त्तव्य का पालन करो। गुरु की आज्ञा का अतिक्रमण खुद अपनी कब्र खोदने के बराबर है। सदगुरु शिष्य पर सतत आशीर्वाद बरसाते हैं। आत्मसाक्षात्कारी गुरु तत्वदर्शी जगदगुरु हैं, परम गुरु हैं।सदगुरु का हृदय सौन्दर्य का धाम है। जीवन का ध्येय गुरु की सेवा करने का बनाओ। जीवन का हर एक कटु अनुभव गुरु के प्रति आपकी श्रद्धा की कसौटी है।शिष्य कार्य की गिनती करता है जबकि गुरु उसके पीछे निहित हेतु और इरादे की तुलना करते हैं। गुरु के कार्य को सन्देहपूर्वक देखना सबसे बड़ा पाप है।गुरु के समक्ष अपना दम्भपूर्ण दिखावा करने की कभी कोशिश मत करना। शिष्य के लिए तो गुरु आज्ञापालन जीवन का कानून है।अपने दिव्य गुरु की सेवा करने का कोई भी मौका चूकना नहीं।जब आप अपने दिव्य गुरु की सेवा करो तब एकनिष्ठ और वफादार रहना। गुरु पर प्रेम रखना, आज्ञापालन करना यानी गुरु की सेवा करना।मंत्र का अर्थ है अर्थात जोक विचार से, संकल्पों और विकल्पों से रक्षा करता है उसे मंत्र कहते हैं। जो तार देता है उसे मंत्र कहते हैं।एक है विचार का जगत तो दूसरा है निर्विचार का जगत, एक है बुद्धि का जगत तो दूसरी ओर आत्मा का जगत। बुद्धि का संसार द्वन्दों का संसार है वहां सदैव असमाधान की आंधिया चलती रहती हैं।उस संसार में जीने वाला व्यक्ति सदैव संघर्षशील रहता है, दुखों से घिरा रहता है। और आत्म जगत में विहार करने वाला व्यक्ति सदैव सुख में रहता है।तो मंत्र एक सेतु का कार्य करता है। उसके सहारे से साधक विचार की विशाल सागर को सहजता से पार कर लेता है।परंतु इसके लिए आवश्यक है कि वह दीक्षित किसी सद्गुरु से हो किसी पुस्तक को पढ़कर या किसी से सुनकर अगर आप मंत्र का उपयोग करेंगे तो वह कभी लाभ न देगा। वह मंत्र तारक नहीं बनेगा वह मंत्र बाधक बनेगा।
संपूर्ण जगत में इस वक्त जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल महाराज जी एक ऐसे संत हैं जिसे नाम दीक्षा देने का अधिकार है।जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल महाराज जी ने कहा कि, जिसे मंत्र देने का अधिकार है वही नाम दीक्षा दे सकता है अनाधिकारी व्यक्ति को नाम दीक्षा देने का अधिकार नहीं है।जगतगुरु तत्वदर्शी सन्त रामपाल महाराज जी ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि तत्वदर्शी संत ही नाम दीक्षा दे सकता है। इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है की एक बार एक राजा किसी विशेष कार्य से अपने मंत्री के घर गया। राजा के साथ उसके अंगरक्षक भी थे। जिस समय राजा मंत्री के घर पहुंचा उस समय मंत्री अपने साधना कक्ष में किसी मंत्र की साधना कर रहा था।मंत्री का जप पूरा होने तक राजा को प्रतीक्षा करनी पड़ी। जप पूरा होने के पश्चात मंत्री कक्ष से बाहर आया और उसने राजा का अभिनंदन अभिवादन किया। राजा ने मंत्री से पूछा कि, कक्ष में तुम क्या कर रहे थे ? मंत्री ने कहा महाराज !! मैं मंत्र की साधना कर रहा था। राजा बोला वह मंत्र तुम मुझे भी दो जिससे मैं भी जप कर सकूँ।मंत्री ने कहा महाराज मंत्र देने का अधिकार मेरे पास नहीं है, किन्ही सद्गुरु से ही आप मंत्र ग्रहण कर सकते हैं ।राजा ने हठ किया !! नही मैं किसी गुरु-वुरु को नही जानता तुम्हें मुझे मंत्र देना होगा यह मेरा आदेश है।
अब राज हठ के सामने मंत्री क्या करे ? परन्तु मंत्री बुद्धिमान था उसने एक युक्ति से राजा को समझाने का प्रयत्न किया Iउसने राजा के साथ आये हुए अंग रक्षकों को आदेश दिया कि : सैनिकों राजा को गिरफ्तार कर लो, सैनिकों ने मंत्री के बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया।मंत्री ने कई बार अपने आदेश को दोहराया कि राजा को गिरफ्तार कर लो मेरे आदेश का पालन कर लो राजा को गिरफ्तार कर लो परन्तु सैनिकों ने मंत्री के आदेश पर ध्यान न दिया।मंत्री ने विचित्र आदेश दिया यह सुनकर राजा को बहुत क्रोध आया। उसने अपने सैनिकों से कहा कि इस मंत्री को तुरंत गिरफ्तार कर लो। राजा का आदेश मिलते ही सैनिको ने मंत्री को तत्क्षण गिरफ्तार कर लिया।तब मंत्री ने कहा महाराज मैंने आपको उत्तर दे दिया है। राजा ने कहा तुमने उत्तर कैसे दिया ? महाराज ये सैनिक आपके अधिकार में है मेरे अधिकार में नही। मैंने अनाधिकार चेष्टापूर्वक इनको आपके गिरफ्तारी का आदेश दिया। इन्होंने आपके आदेश का पालन किया और मुझे गिरफ्तार किया।मंत्री ने स्पष्ट किया कि महाराज जिसके अधिकार में है अगर वह व्यक्ति आदेश दे तो काम शीघ्र बन जाता है।अनाधिकार चेष्टा कोई करे तो दुष्परिणाम होता है।ऐसे ही मंत्र दीक्षा का अधिकार मेरे पास नहीं जिसके पास है वह अधिकारी है और वही दे सकते हैं। और उन्हीं से प्राप्त मंत्र फलदाता सिद्ध होता है उसी मंत्र में शक्ति होती है जो सद्गुरु से लिया जाता है। उन्हीं के द्वारा दिया गया मंत्र अनेक शक्तियों से सम्पन्न होता है।गुरुदेव जब मंत्र प्रदान करते हैं उसमें उनकी शक्ति भी सम्मिलित होती है
उनकी सम्पूर्ण शक्ति सम्मिलित होती है।जीवन में कभी दुख और पीड़ा आये तो उसे चुपचाप पी जाना अपने दुख और दर्द संसार के लोगो को मत दिखाना।क्योंकि ये संसारी जन स्वयं दुःख रुपी रोग से ग्रसित हैं ये कोई वैद्य नहीं है जो तुम्हारी समस्या का समाधान दे सकें।यह दुनिया बड़ी कठोर है हमारे दुख को रो रोकर पूछेगी और आपको ममता और अज्ञान में ही डालेगी समाधान नहीं देगी।अपने जख्म उन लोगों को न दिखाना जिनके पास मरहम ना हो। वे स्वार्थी लोग और अज्ञान से ग्रसित लोग मरहम लगाने के स्थान पर तुम्हारे जख्मों को और भी नासूर बना देंगे जो कभी ठीक न हो पायेगा। अगर कोई हमारे जख्मों पर मरहम लगा सकता है तो वह सद्गुरु ही हो सकते हैं । दुखों को सदा के लिए निर्मूल कर सकते हैं।तो वे एक सद्गुरु ही हो सकते हैं। वही हमारे साथ सदैव मंत्र के रूप में प्रत्यक्ष विद्यमान रहते हैं।



















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