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Thursday, July 15, 2021

मुक्ति के साधन,भजन,सिमरन,भक्ति नाम दीक्षा:- तत्वदर्शी संत रामपाल महाराज जी

 बालोद 

सी एन आई न्यूज़ 

बालोद:-जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल महाराज जी ने  उपदेश दिया कि मौत के मुँह में पड़े हुए मनुष्य का भोगों की तृष्णा रखना वैसा ही है जैसा सर्प के मुँह में पड़े हुए मेंढक का मच्छरों की ओर झपटना। पता नहीं कब मौत आ जाये? इसलिए भोगों से मन हटाकर दिन-रात परमात्मा  के  गुण, लीला व नाम जाप में मन को लगाना चाहिए|जब तक स्वास्थ्य अच्छा है तब तक भजन में आसानी से मन लगाया जा सकता है। अस्वस्थ होने पर बिना अभ्यास के, जाप रुपी मंत्र का स्मरण होना बहुत कठिन हो जायेगा।इस लिए प्रार्थना करना चाहिए कि -हे परमात्मा कबीर साहेब ! मेरा यह मनरूपी राजहंस तुम्हारे चरणकमल रुपी पिंजरे में आज ही प्रवेश कर जाये, ऐसी कृपा करना प्रभु।प्राण निकलते समय जब कफ-वात-पित्त से कंठ रुक जायेगा, इन्द्रियां अशक्त हो जाएँगी तब स्मरण तो दूर रहा, प्रथम ,दुसरा जाप मंत्र आदि   नामोच्चारण भी नहीं  हो पाएगा ।अतएव अभी से मन को परमात्मा में लगाओ  और जिव्हा से  नाम का जप आरम्भ कर दो ।धन-ऐश्वर्य, कुटुम्ब-परिवार सब के सब क्षणभंगुर हैं। इनकी प्राप्ति में सुख की प्रतीति होती है लेकिन है नहीं, वरन  इनकी प्राप्ति से दुःख ही बढ़ते हैं। संसार में ऐसा कोई भी विचारशील पुरुष नहीं है जो विवेक-बुद्धि से यह कह सकता हो कि इनमें से उसे कोई सुख मिला। यहाँ कि प्रत्येक स्थिति में विरोधी स्थिति वर्तमान है  - सुख चाहते हैं मिलता है दुःख, स्वास्थ्य चाहते हैं तो आती है बीमारी, प्रकाश के पीछे अंधकार लगा है, जवानी के साथ बुढ़ापा सटा है, जीवन की विरोधी मृत्यु सिर पर सवार है। यह तो मूर्खता है, जो हम विषयों में सुख मानकर दुर्लभ मानव जीवन को खो देते हैं।परंतु विचार कर देखिये, मनुष्य सचमुच इसी तरह अपने अमृत-से मानव-जीवन को विषय-विष बटोरने व चाटने में लगा रहता है। इस से उसे एक के बाद दूसरा - लगातार दुखों के बवंडर से जूझना पड़ता है।याद रखो, यहाँ की कोई भी वस्तु, कोई भी सम्बन्ध उसको दुखों से नहीं छुड़ा सकता है, क्योंकि वह स्वयं बंधा हुआ है।जगत गुरु तत्वदर्शी संत रामपाल महराज जी द्रारा दिया नाम दीक्षा ही एक  मात्र ऐसा साधन है, जो मनुष्य को दुःख के सारे बन्धनों से छुड़ा सकता है

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