राऊत नाचा का धमाल
दीपावली के बाद राऊत यानी ग्वाले लोगो की टीम घर घर जाकर नगाड़े की थाप पर नाचते गाते करते है मनोरंजन
बालाघाट। दीपावली के बाद स्थानीय लोग कई तरह से नाच गाकर मनोरंजन करते हैं जिसमे बैगा आदिवासियों का कर्मा ददरिया के बाद राऊत नाचा प्रमुख होता है जिसमे ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे गांव के जानवरों को चराने वाले चरवाहा को राऊत कहते हैं जिसको पूरा गांव मिलकर मजदूरी देता है जिससे राऊत का परिवार का भरण पोषण होता है।ग्वालवंशी के वंशज होने से इनको ग्वाले या राऊत के नाम से जाना जाता है।दीपावली के एक दिन बाद यानी गोवर्धन पूजा के दिन जगह जगह राऊत नाचा का आयोजन किया जाता है जिसमे गांव के आसपास के सभी ग्वाले उर्फ राऊत इक्कट्ठा होकर लाठी खेल खेलते हैं जिसको देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण इक्कट्ठा होते हैं।राऊत नाचा का कार्यक्रम कई दिनों तक चलता है जो एक टोली बनाकर घर घर जाकर देर रात तक नगाड़े की थाप पर नाचते है जिसपर घर वाले कुछ न कुछ इनाम स्वरूप राऊत लोगो को देकर विदा करते है।चूंकि राऊत पूरे गांव के जानवरों को चराने का कार्य करता है इसलिए पूरे गांव में घूमकर नगाड़े की थाप पर नाचते गाते मनोरंजन करते है जो राऊत नाचा के नाम से प्रसिद्ध है।

















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