सूरज ढलने के पहले खाना खाने को मजबूर बैगा आदिवासी
बिजली न होने के कारण अंधेरा होने के पहले ही सारा कार्य पूरा करते हैं आदिवासी बैगा
बालाघाट। आधुनिकता की इस दौड़ में बिना बिजली के रहना किसी सजा से कम नही है।लेकिन बालाघाट जिले के बिरसा जनपद अंतर्गत मछुरदा के ग्राम गठिया व लिखन पथरा के आदिवासी बैगा पिछले कई वर्षों से बिना बिजली के जीवन जी रहे हैं।ग्रामीणों ने शासन से पूछा कि क्या हम इस देश के नागरिक नही है?क्या हम टेक्स युक्त सामान नही खरीदते?क्या हमें आज के दौर में जीने का अधिकार नही?अगर हां तो हमारे गांव में अभी तक बिजली क्यों नही है।देखा जाए तो इनकी एक एक बात सही है।आमलोगों के यहां अगर दो घंटे बिजली किसी कारण वश चली जाती है तो हायतौबा मचा देते है तो सोचिए आज सबके हाथ मे जब मोबाइल और नेट आ गया है तो ऐसे में बिना बिजली के रहना बेमानी लगता है।इस बारे में कई बार ग्रामीणों ने स्थानीय प्रशासन से गुहार लगाई पर नतीजा शून्य रहा। बिजली न होने के कारण बैगा आदिवासियों के बच्चे पढ़ नही पा रहे हैं।रात होने के पहले भोजन करना इनकी मजबूरी बन गयी है नही तो भोजन में कीड़े मकोड़े पड़ने की संभावना रहती है जिससे सूरज ढलने के पहले पूरा गांव भोजन कर लेता है अगर कोई छूट जाता है तो लकड़ी जलाकर उजाला किया जाता है जिसकी रोशनी में वह व्यक्ति भोजन करता है।बिजली न होने से सांप बिच्छू के काटने का डर बना रहता है।सोचिए बिजली न होने से इस ग्राम के लोगों को कितनी परेशानी होती होगी।गांव के लिखनु बैगा ने बताया कि जब आस पास बिजली नही थी तब हमे कोई दिक्कत नही थी लेकिन जबसे मछुरदा सहित अन्य ग्रामो में बिजली पहुंच गई है और हमारा गांव ही बिजली विहीन है तो अन्य ग्रामो को देखकर बुरा लगता है कि शायद हम इस देश के निवासी ही नही है तभी तो हमारे गांव में अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है।इस बारे बालाघाट अधीक्षण यंत्री ने बताया कि अभी ऐसी कोई योजना न होने से फिलहाल उक्त ग्राम में बिजली पहुंच पाना मुश्किल है।साहब ने योजना का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ लिया अब देखना यह है कि शासन बैगाओं की आवाज सुनता है कि नहीं?या बैगा आदिवासी आने वाले कई और वर्षो तक अंधेरे में ही रहने को मजबूर होंगे।

















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