ठंड के मारे,लकडी के सहारे आदिवासी बैगा
(वनों में निवास करने वाले बैगा परिवारों के लिए गिरता पारा मुसीबतों भरा होता है)
शिवशंकर पाण्डेय की विशेष रिपोर्ट
बिरसा/बालाघाट।पुरानी कहावत है कि लइकन को छुअब नही जवान लगे भाई अउ डोकरा को छोड़ब नही कितनो ओढ़े रजाई।लेकिन वनों में निवास करने वाले देश के आदिमानव के लिए ठंड किसी मुसीबत से कम नही होती,जिसकी खास वजह होती है बैगाओं के पास साधन का न होना,इनके बचाव के लिए सबसे बड़ा साधन है लकड़ी जो जंगल में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है जिसके सहारे इनकी रात कटती है।हालांकि इनके लिए लकड़ी हर मौसम में बहुत बड़ा सहारा होती है।ठंड में शरीर को गर्म करने के लिए, बाकी मौसम में उजाले के लिए लकड़ी को जलाकर उपयोग में लाया जाता है।बहरहाल गिरता पारा बैगाओं के लिए नई मुसीबत लेकर आता है।दिन भर धूप के सहारे तो कट जाता है लेकिन शाम होते ही पूरा परिवार एक जगह लकड़ी जलाकर रात काटने के लिए विवश होते हैं।आमलोगों को तो कही आने जाने में समय होने पर ही ठंड का एहसास होता है लेकिन असली ठंडी का मतलब इन वनवासियों से बेहतर कोई नही जान सकता।शाम होते ही सभी बैगाओं के झोपड़ी के सामने बड़ी बड़ी लकड़ियों को जलाकर शरीर को गर्म करने का प्रयास करते हैं।
गिरते बर्फ ने बदला मौसस का मिजाज
दो दिनों से क्षेत्र में बर्फ गिरने से भी पारा लुढ़क गया है जिससे लोग शाम होते ही घरों में दुबकने पर मजबूर हैं।लोगो की कोशिश यह रहती है कि अपना काम जल्द से जल्द निपटा कर घर में दुबक जय जाय।नगरीय क्षेत्रों में भी लोगो को ठंड से ठिठुरते देखा गया है।क्योंकि मलाजखंड नगर परिषद के द्वारा बराबर अलाव की व्यवस्था नही करने का आरोप क्षेत्र वासी लगा रहे है।बहरहाल अपने मे मस्त रहने वाले बैगा जैसे तैसे अपना जीवन निर्वाह करते हैं जिस पर प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत है।

















No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.