भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान का आधार है संस्कृत – डॉ रश्मि जेता ।
दमोह। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय दमोह के संस्कृत विभाग के द्वारा “वैदिक वाङ्गमय एवं भारतीय संस्कृति” विषय पर राष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ रश्मि जेता थे।
जिन्होंने वैदिक ज्ञान परम्परा प्रारम्भ से ही मानव जीवन की मूलभूत समस्याओं के निदान के लिए प्रयत्नशील रही । एवं भौतिक उन्नति के साथ-साथ मानव के आध्यात्मिक विकास के लिए संस्कृत भाषा एवं वैदिक साहित्य कैसे अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
साथ ही साथ छात्र-छात्राओं को अपनी भाषा और ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रेरित किया।
प्राचार्य डॉ. के. पी. अहिरवार कार्यक्रम में अध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहे। जिन्होंने भारतीय साहित्य की परम्परा पर आधारित आपके व्याख्यान में परम्परागत साहित्य की विशेषताओं तथा महत्त्व को बताया एवं ज्ञान की अभिवृद्धि को वर्तमान काल की महती आवश्यकता बताते हुए इसके लिए कार्य करने की प्रेरणा दी। साथ ही संस्कृत के महान् कवि कालिदास एवं उनकी अमर कृति अभिज्ञानशाकुन्तलम् पर अपने विचार व्यक्त किए।
विशिष्ट आमन्त्रित वक्ता के रूप में डॉ कीर्तिकाम दुबे ने बताया कि वर्तमान में सृजित हो रहे काव्यों में रावण जैसी दुष्ट प्रवृत्ति को छोडकर राम, कृष्ण जैसे व्यवहार को अपनाने की प्रेरणा का अभाव है। ऐसा साहित्य अपनी आत्मा ही ना खो दे ऐसी चिन्ता व्यक्त करते हुए साहित्य का उपयोग जनमानस को उचित प्रेरणा देने के लिए हो ऐसी कामना जाहिर की।
संगोष्ठी के समन्वयक एवं संस्कृत विभाग के विभागध्यक्ष डॉ के एस बामनिया ने संस्कृत भाषा के महत्त्व को दर्शाते हुए वर्तमान में वैदिक जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। तथा संस्कृत वाङ्मय के अध्ययन एवं शोध पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता दर्शायी। एवं बताया कि संस्कृत मानव जाति की प्राचीनतम सम्पत्ति है जिससे भारत की अधिकांश भाषाएँ, धर्म-दर्शन, विचार, सभ्यता एवं संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ।
संगोष्ठी के संयोजक प्रो. जितेन्द्र धाकड ने वर्तमान समय में समाज में जीवन मूल्यों एवं मानवीय संवेदना के दिन प्रतिदिन क्षीण होने पर चिन्ता जाहिर की तथा संस्कृत साहित्य में निहित ज्ञान के आधार पर मानवमात्र के कल्याण की सम्भावना दर्शायी। एवं सभी विद्वानों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में संस्कृत विभाग के अरविंद कुर्मी, आशीर्वाद मिश्रा, तेजीलाल अहिरवार, क्लीन खान, प्रज्ञा दुबे, शान्ति कुर्मी, आरती लोधी, शिवानी पाण्डेय, उपासना सिंह इत्यादि शताधिक छात्र-छात्राओं के साथ साथ महाविद्यालयीन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की सक्रिय भूमिका रही।

















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