अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जांजगीर चांपा - कोसा , कांसा कंचन की नगरी एवं मां समलेश्वरी की पावन धरा चाम्पा के हनुमान धारा रोड स्थित दामोनंद निक भवन में चल रहे संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस काशी - वृंदावन से पधारे सुविख्यात , कथाकार , भागवत्मणी , पुराणाचार्य पं० विश्वकांताचार्य जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह का प्रसंग सुनाया। महाराज जी ने बताया कि विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी के पांच भाई - रूक्मी , रूक्मरथ ,रूक्मबाहु , रूक्मकेस और रूक्ममाली थे। रूक्मिणी सर्वगुणसंपन्न थीं , उनके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे अत: लोग उसे लक्ष्मी स्वरूपा कहा करते थे। भीष्मक और रुक्मिमणी के पास जो भी लोग आते - जाते वे सभी श्रीकृष्ण की प्रशंसा किया करते थे। श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर रुखमणी ने मन ही मन यह तय कर लिया था कि वह श्रीकृष्ण को छोंड़कर किसी अन्य को पति रूप में स्वीकार नहीं करेंगी। रूक्म अपनी बहन का विवाह अपने मित्र शिशुपाल से करना चाहता था। रूक्मी ने माता - पिता के विरोध के बावजूद अपनी बहन का शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी। रूक्मिमणी को जब यह बात पता चला तो वे अत्यंत दु:खित होकर एक ब्राह्मण के हाथ पत्र लिखकर श्रीकृष्ण के पास द्वारिका भेज दी।
श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का संदेश पढ़ा- 'हे नंद-नंदन! आपको ही पति रूप में वरण किया है। मैं आपको छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। मेरे पिता मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहते हैं , विवाह की तिथि भी निश्चित हो गई। मेरे कुल की रीति है कि विवाह के पूर्व होने वाली वधु को नगर के बाहर गिरिजा का दर्शन करने के लिये जाना पड़ता है। मैं भी विवाह के वस्त्रों में सज-धज कर दर्शन करने के लिये गिरिजा के मंदिर में जाऊंगी। मैं चाहती हूं , आप गिरिजा मंदिर में पहुंचकर मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें। यदि आप नहीं पहुंचेंगे तो मैं आप अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगी। इधर जब रुक्मिणी ने गिरिजा की पूजा करते हुये उनसे प्रार्थना की हे मां ! तुम सारे जगत की मां हो इसलिये मेरी भी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। रुक्मिणी जब मंदिर से बाहर निकली तो उन्हें यह समझने में बिल्कुल भी संशय नहीं रहा कि श्रीकृष्ण भगवान ने ही उसके समर्पण को स्वीकार कर लिया है। जैसे ही वे पूजा करके मंदिर से बाहर निकली वैसे ही श्रीकृष्ण जी ने विद्युत तरंग की भांति पहुंचकर उनका हाथ थाम लिया और अपने रथ पर बिठाकर द्वारका की ओर चल पड़े। भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी को द्वारका ले जाकर उनके साथ विधिवत विवाह किया। उन्होंने बताया कि प्रद्युम्न उन्हीं के गर्भ से उत्पन्न हुये थे जो सृष्टि में कामदेव के अवतार थे। आखिरकार रुक्मी और शिशुपाल के विरोध के कारण ही श्रीकृष्ण को रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा। दरअसल शिशुपाल श्रीकृष्ण की बुआ का लड़का था।
श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को वचन दिया था कि मैं इसके एक सौ अपराध क्षमा कर दूंगा। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया। अत: एक यज्ञ समारोह में उसने श्रीकृष्ण को भरी सभा में अपमानित करने की सारी हदें पार कर दीं , तब श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। इसके अलावा महाराजश्री ने रासपंचाध्यायी (रासलीला ) , युगलगीत , नारद कंस संवाद , अक्रूर का ब्रजगमन , गोपियों का विलाप , उद्धव व्रज गमन ,भ्रमरगीत , मथुरा पर जरासंध के आक्रमण , श्रीकृष्ण का मथुरा गमन एवं कंस वध का भी विस्तृत वर्णन किया। वहीं कथा के विश्राम दिवस महाराजश्री कल राजसूय यज्ञ , सुदामा चरित्र की कथा सुनायेंगे और इसी के साथ सतदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का विश्राम होगा। कथा के दौरान प्रतिदिन सुबह नौ बजे से कांशी के आचार्य पं० विरेंद्र तिवारी एवं पं० श्रीराम चौबे द्वारा रूद्राभिषेक भी कराया गया। कामधेनु सेना के प्रदेश प्रवक्ता जयप्रकाश द्विवेदी ने सभी श्रद्धालुओं से कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुये श्रीमद्भागवत कथा एवं रूद्राभिषेक कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है।

















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